31/8/10

चाय भी ठंडी हो गयी

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उसको आखिर पैसों की उतनी चिन्ता क्यों नहीं रहती ? मैं देख रहा था की वो मन से अपना काम करे जा रही थी . सुबह सुबह रोज , अपने घर को छोड़ के किसी और के घर को देखना , सम्हालना , मुश्किल होता होगा . लेकिन उसको देख के नहीं लगता .
उसको शायद पैसों की उतनी चिन्ता इस लिए नहीं होती होगी क्योंकी सारी तो हम कर लेते हैं , सोंचती होगी जरूर क्योंकि जब वो मेरे कमरे में सफाई करने आती है तो कभी - कभी , मेरा मूड देख के कहती है , "अरे भईया आप आराम भी कर लिया करो कभी , हर समय इस लैइपताप में का बनाते रहते हो ? " और कभी जब देखती है की चाय वैसी ही रखी है तो "... देखिये चाय भी ठंडी हो गयी ... हाँ नहीं तो "
इस से ज्यादा नही कह पाती , के कहीं मैं गुस्सा ना हो जाऊं या फिर शायद नौकरी ना चली जाये... उसको भी शायद पैसों की चिन्ता हो जाती होगी
भरत
३१/०८/२०१०
१०:२५

30/8/10

Rooh ke Gahne रूह के गहने

9 टिप्‍पणियां:

तुम्हें मालूम नहीं क्या काम किया है तुमने

कर दिया खुद को जो है उसके हवाले तुमने

 

अब भला क्यों थाम के बैठूँ दिल को अपने

सौंपा है उसको ही पहनाया ये चोला जिसने

 

जाओ बेफिक्र हो जहाँ भी तुझको अब है जाना

उसकी चाहत है जो पहरा उसके क्या कहने..

 

ज़िंदगी अब खुद-ब-खुद बा मायने भी होगी

अब उसके करम के ज़र्रे हैं ,तेरी रूह के गहने

 

तुम उसको इश्क कहो या कहो खुदा अपना

लिखना माथे पे जो था, लिख दिया है उसने

 

बात बे-साज़ की और लकीरें तेरी पेशानी पर

बता तुझ जैसे भरत उसके आशिक़ कितने ?

 

…भरत तिवारी / नई दिल्ली / ३०/०८/२०१०

 

tumhen mālūm nahin kya kaam kiya hai tum’ne

kar diya ḵẖud ko jo hai us’ke ḥawāle tum’ne

 

ab bhala kyon thām ke baith’oon dil ko ap’ne

saunpa hai us’ko hi pah’naya ye chola jis’ne

 

jaao be-fika ho jahan bhi tujhako ab hai jana

us’ki cha’hat hai jo pah’ra us’ke kya kah’ne

 

zindagi ab khud-b-khud ba maay’ne bhi hogi

ab us’ke karam ke zarre hain ,teri ruuh ke gah’ne

 

tum us’ko ishq kaho ya kaho khuda ap’na

likh’na maa’the pe jo tha, likh diya hai us’ne

 

baat be-saaz ki aur lakeer’en teri pesha’ni par

bata tujh jaise bharat us’ke aashiq kit’ne ?

 

… bharat tiwari / new delhi / 30/08/2010

29/8/10

भीगना bheegna بھیگنا

2 टिप्‍पणियां:





आने को तो बारिश 


सुबह से आयी थी ...


हम तो तब जागे  


जब तेरी याद आयी ...


aane ko toh baarish
subah se aayi thi...
hum toh tab jaa'ge
jab teri yaad aayi ...


آنے کو تو بارش
...صبح سے آیئ تھی
ہم تو تب بھیگے
...جب تیری یاد آیئ


27/8/10

iltjaa / इल्तजा/ التجا

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मैं तेरा हूँ , खुद का बनाये रखना !
कहीं गुरूर जो आये मत बख्श्ना !
main tera hoon, khud ka banaye rakhna !
kahin gurur jo aaye, mat bakhshna !
میں تیرا ہوں , خود کا بنے رکھنا !
کہیں گرور جو اے مت بخشنا !
bharat tiwari

26/8/10

uss ki taqat / उसकी ताकत / اسکی تاکت

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jab bhi jaata hoon us'se milne, bina maange hi toh'fe mil jaate hain

uss ki taqat hai sirf us'ko pata... 

yaad se jiski sar sajde ko jhuk jaate hain

जब भी जाता हूँ उससे मिलने , बिना मांगे ही तोहफ़े मिल जाते हैं 
उस की ताकत है सिर्फ उसको पता ,
याद से जिसकी सजदे को झुक जाते हैं 
جب بھی جاتا ہوں اسسے ملنے , بنا مانگے ہی توہافے مل جاتے ہیں 
اسکی تاکت ہے صرف اسکو پتا ,
یاد سے جسکی سجدے کو جھک جاتے ہیں

bharat tiwari 

25/8/10

बे-वज़ा इलज़ाम / be-wajah ilazaam / بے-وجہ الجام

2 टिप्‍पणियां:

क्यों बे-वजह इलज़ाम लगाया ?... 

पीर को शक ने सूली पे चढ़ाया ?...

आज तारीख़ उसके नाम पर है...
देखो कहाँ वो पलट के आया...


घर उसका मान के झुक जाते हो... 
किसने एक सजदे से उसको पाया... 

हर घड़ी अपने आप को टटोलो...
घर उसने है तेरी रूह को बनाया...

यह नज़र भी उसकी निअ'मत है...
भरत ना समझे किसी को पराया...
भरत १६/०८/२०१० – १५:५०


kyon be-wajah ilzaam lagaya ?...
peer ko shak ne sooli pe chadhaya ?...
aaj tareekh us’ke naam par hai...
dekho kahan wo palat ke aaya...

ghar uska maan ke jhuk jaate ho...
kisne ek sajde se us ko paaya...

har ghadi ap’ne aap ko tatolo...
ghar usne hai teri rooh ko banaya...
ye nazar bhi uski neymat hai...
bharat na samajhe kisi ko paraya...
bharat tiwari 16/8/2010



...? کیوں بے-وجہ الجام لگایا
...? پیر کو شک نے سولی پی چڈھایا ?...
...آج تاریخ اسکے نام پر ہے...
...دیکھو کہاں وو پالت کے آیا...

...گھر اسکا ماں کے جھک جاتے ہو...
...کسنے ایک سجدے سے اسکو پایا...

...ہر غدی اپنے آپ کو ٹٹولو...
...گھر اسنے ہے تیری روح کو بنایا...

...یہ نظر بھی اسکی निअ'مت ہے...

...بھارت نہ سمجھ کسی کو پریا...

بھارت

24/8/10

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आज त्यौहार है...
या के व्यापार है ?


Aaj Tyohaar Hai...
Yaa Ke Vyapaar Hai...


Bharat 24/8/2010

इरादा / iraada

1 टिप्पणी:
हम को कहाँ ये था की यों इरादे रखते
उसकी जलवागिरी थी के बस  हो गये
भरत २४/८/२०१० 
मैं मानता हूँ आसान तू सब करता है 
हूँ मैं इन्सान और तुम तो खुदा हो गये
hum ko kahan ye tha kii yon iraade rakh'te... 
uski jalwagiri thi ke bas ho gaye...


...bharat tiwari

23/8/10

अदा-ए-खुमारी / ada-e-khumari / ادا-ا-خماری

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हसीन मोड़ था क्यों तूने यहाँ ला छोड़ा है ?
ड़ूबे हैं उसी लम्हे में जहाँ तूने यों छोड़ा है..

अब उस से बात करते तो किस तरह करते
था ये मसला दुआ का सो दुआ पे छोड़ा है ...

नशा हर अदा में तेरी, शराब में क्या देखूं ?
ये कैसा खुमार तूने मेरी रूह पे छोड़ा है ...

इतना यकीन कहाँ खुद पर मुझे कभी था ?
अब बात उसकी थी, सो उस पे ही छोड़ा है...

तेरी अदा-ए-खुमारी से मय बेखबर ही रही
था हिरास-ए-नशा जो मयकदे में ही छोड़ा है..

मगरुरियत भरत की जाती रही है अब
तेरे करम पे जब से खुदी को छोड़ा है...
Painting
Courtesy Mr Pankuj Parashar
(inkjet and acrylic on canvas)

haseen mod tha kyon tuune yahan la chhoda hai ?
daoobe hain usi lamhe men jahan tuune yon chhoda hai ...

ab us se baat karte to kis tarah karte
tha ye masla dua ka so dua pe chhoda hai ...

itna yakeen kahan khud par mujhe kabhi tha ?
ab baat usski thi, so uss pe hi chhoda hai…

nasha har ada men teri, sharab men kya dekhoon
ye kaisa khumaar tuune meri ruh pe chhoda hai ..

teri ada-e-khumari se mai bekhabar hi rahi
tha hiraas-e-nasha jo maykade men hi chhoda hai…

magruriyat bharat ki jaati rahi hai ab
tere karam pe jab se khudi ko chhoda hai ..

...bharat
23/8/2010  9:57

حسین موڈ تھا کیوں تونے یہاں لا چھودہ ہے ?
ڈوبے ہیں اسی لمحے میں جہاں تونے یوں چھودہ ہے..

اب اس سے بات کرتے تو کس طرح کرتے
تھا یہ مثلا دوا کا سو دوا پی چھودہ ہے ...

نشہ ہر ادا میں تیری, شراب میں کیا دیکھوں ?
یہ کیسا خمار تونے میری روح پی چھودہ ہے ...

اتنا یکین کہاں خود پر مجھے کبھی تھا ?
اب بات اسکی تھی, سو اس پی ہی چھودہ ہے...

تیری ادا-ا-خماری سے مایا بےخبر ہی رہی
تھا ہراس-ا-نشہ جو میکدے میں ہی چھودہ ہے..

مگرریت بھارت کی جاتی رہی ہے اب
تیرے کرم پی جب سے خودی کو چھودہ ہے...

21/8/10

Tabassum Hai Saboot / तबस्सुम है सबूत

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Click to enlarge... Regards Bharat Tiwari


इन मंदिरों मस्जिदों मज़ारों पर ऐतबार रख
कभी न कभी वो ज़रूर मिलेगा ऐतबार रख

क्यों कर रहा है तू बेवजह रूहों को परेशान
ये गम की रात बीत जायेगी, तू ऐतबार रख

सहर होने को है वो भी बस आने ही लगा है 
लबों की तबस्सुम है सबूत के तू ऐतबार रख

उसने कुछ सोंच ही दिलों को मिलाया होगा

खुद की नहीं उसकी सोंच पे तो ऐतबार रख

तू इन पहाड़ों को इन दरख्तों को देख जरा
कह रहे हैं उसकी जलवागिरी पे ऐतबार रख

आशिक की हर बात वो मान लेता है भरत
तू अपने सज़दे पर भी तमाम ऐतबार रख  

In Mandiron Masjidon Mazar’on Par Aitbaar Rakh
Kabhi Na Kabhi Wo Zaroor Milega Aitbaar Rakh

Kyon Kar Raha Hai Tuu Be-Wajh Rooh’on Ko Pareshaan
Ye Gam Ki Rat Beet Jaayegi, Tuu Aitbaar Rakh

Sahar Hone Ko Hai Wo Bhi Bas Aane Hi Laga Hai 
Labon Ki Tabassum Hai Saboot Ke Tuu Aitbaar Rakh

Uss’ne Kuch Sonch Hi Dil’on Ko Milaya Hoga
Khud Ki Nahin Uss’ki Sonch Pe To Aitbaar Rakh

Tuu In Pahadon Ko In Darakht’on Ko Dekh Zara
Kah Rahe Hain Usski Jalwah’giri Pe Aitbaar Rakh

Aashiq Ki Har Baat Woh Maan Leta Hai Bharat
Tuu Apne Sazde Par Bhi Tamaam Aitbaar Rakh
Bharat Tiwari 29/08/2010 2:25

ان مندروں مسجدوں مزاروں پر اعتبار رکھ
کبھی ن کبھی وو ضرور ملیگا اعتبار رکھ

کیوں کر رہا ہے تو بوجہ روحوں کو پریشان 
یہ گم کی رات بیت جاےگی, تو اعتبار رکھ

سحر ہونے کو ہے وو بھی بس آنے ہی لگا ہے  
لبوں کی تبسّم ہے ثبوت کے تو اعتبار رکھ

اسنے کچھ سونچ ہی دلوں کو ملایا ہوگا
خود کی نہیں اسکی سونچ پی تو اعتبار رکھ

تو ان پحدوں کو ان درختوں کو دیکھ جرا
کہ رہے ہیں اسکی جلوگیری پی اعتبار رکھ

اشک کی ہر بات وو ماں لیتا ہے بھارت
تو اپنے سجدے پر بھی تمام اعتبار رکھ  
بھارت

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