17/12/10

कोशिश

main parinda ban raha hoon

Main Parinda Ban Raha Hoon Ab
Paron Ki Koplen
Aane Lagi Hain

Tumne
Saat Hi Aakash Banaye Hain
Ik Naya Banane Ki Chaah Hai

Tum Kis Aakash Se Dekhte Ho
Dekhte Ho Jis Kisi Se Bhi
Dekh Leta Hoon
Parda Hatake Khidaki Ka

Bharat 17/12/2010

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही खूब सूरत आप ने भाई जी इस को पेश किया है ...एक साधरण बात को .....पर जो मार्मिकता और मासूमियत से अंतिम पक्तोयों मैं लिखा है आप का समर्पण लिखावट मैं झलका है जी ........वाकई मैं बहुत ही खूब सूरत जी !!!!!!!!!!!!!!देख लेता हूँ पर्दा हटा कर वाह जी वाह !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!शुभ कामनाए भाई जी !!!!!!

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  2. यह कोशिश...
    आकाश बनाने की चाह!
    वाह!
    बड़े सुन्दर विम्ब लिए हुए है यह रचना!

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  3. वाह भरत भाई ,
    मालिक करे की आप और ऊँची उड़ान भरें ,
    नित नए आकाश छुए ,
    बहुत खूब चित्रण है आपकी आंतरिक भावनाओँ का,
    नमन है आपको .............

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  4. तुमने सात ही आकाश बनाये हैं ...
    इक नया बनाने की चाह है ...

    बहुत खूब भरत जी ....इक आठवा आकाश बनाने की बहुत अच्छी "कोशिश " को दर्शाया है अपने अपनी रचना में .... बहुत शुभकामनाएं ..

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  5. aap ki kawita mein naya bhav dekha aathve aakash ka ..wo khidki se parda hatane ki baat to jese subh ki komal pavan

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