27/1/11

तलाश वज़ूद की . . . .

dastakaar bharat tiwari भारत भरत तिवारी

 

टटोल के तुमने
पा ही लिया
मेरा मैं

मैं तो
ना खोज पाया था
तुमने कैसे पाया

पवन हो क्या
पतली सी झीरी
खिड़की में हो
गर्म
सर्द
सी तुम
आ ही जाती हो

तुमने पर्दा भी ना रखा
सामने मेरे
जैसे आइना
वैसे ही

आया करो
एक बार ठहर भी जाओ
मुझे देखना है
झांकना है
या
सच ये है
जानना चाहता हूँ अब खुद को


... भरत तिवारी
२७/०१/२०११
नई दिल्ली

4 टिप्‍पणियां:

  1. kya kahoooon or kehne ko kya reh gaya........


    Lajwab bharat bhai

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  2. वाह भाई जी ...बहुत सुन्दर अक्ष को बाहर निकाल कर आप ने अपने अक्ष पर प्रतिध्वनित हो उठती अनछुई छुअन को कही से उकेरा है शब्दों के जोड़ से जिसकी दृष्टि मूलअक्ष से प्रारम्भ होकर अक्ष पर ही समाप्त होती है ये ही जीवन की सकरात्मक दृष्टि है इंसानी जीवन की खुद का अक्ष उकेरना उसका स्पंदन ..कही जीवन के कार्वाओं को मोड़ता आप का नोट ..खुद को अक्ष में देखने की ताकत भी साथ साथ कही पर जीवन के बहुत करीब आते हर क्षण को कोसों दूर भी पातें है कही ..पर आप की अभिव्यक्ति कही खुद को शीशे में उतारने का एक जरिया भी जीवन में !!!...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति आप की भाई जी ...बधाई दिल से जी !!!!!!!!!!!!Nirmal Paneri

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