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Kahan Kahan Se Mohabbat Aayi / कहाँ कहाँ से मोहब्बत आयी

कहाँ कहाँ से मोहब्बत आयी
हमारे दिल में समाने आयी...

रहा था करता तनहा वीरान
क्या बहार क्या फिजाएँ आयी...

दिखाई अदायें खुदा ने अपनी
असल खुदाई नज़र में आयी...

गज़ले-ए-कुदरत आसमाँ वाली
साज़ बनी है जमीं पे आयी...

सोने को होना था तुमको ‘भरत’
नींद की परियां ही बस ना आयी...

Kahan Kahan Se Mohabbat Aayi
Hamare Dil Men Samaane Aayi...

Raha Tha Karta Tanha Veeran
Kya Bahaar Kya Fizaen Aayi...

Dikhaai Adayen Khuda Ne Apani
Asal Khudaai Nazar Men Aayi...

Gajale-E-Kudarat Aasmaan waali
Saaz Bani Hai Jamin Pe Aayi...

Sone Ko Hona Tha Tumko ‘Bharat’
Nind Ki Pariyan Hi Bas Na Aayi...

(C) Bharat Tiwari All right reserved 

3 टिप्‍पणियां:

  1. ये इश्क भी क्या क्या मंज़र दिखाये..
    कभी तो हंसाये कभी रूलाये..
    कहां से आये कहां को जाये..
    मीठा मीठा दर्द दे जाये..
    चाहती तो हूं.....
    कि ये कुछ पल यहीं ठहर जाये..
    पर जतन क्या करूं,ये समझ ना आये.

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  2. नींद की परियां ही बस ना आयी..अछूता नाज़ुक मगर सच्चा ख्याल .अहसास भरी रचना दिल को छूती है

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  3. गज़ले-ए-कुदरत आसमाँ वाली
    साज़ बनी है जमीं पे आयी.............भरत भाई इन रिदयंगम शब्दों से ही हम है और साज से ही हमारा वजूद है ...और सबसे बढ़िया आप के शब्दों की तारीफ करनी होगी वेसे में शब्दों की तारीफ नहीं करा करता पर आज वाकई में शब्दों का जोड़ बहुत है उच्च है .....बधाई एक और अच्छी रचना के लिए !!!

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