17/2/11

Bandagi / बन्दगी

 

wo shakhsh ab dua nahin kartasaaya
uski har umeed pe na-ummedi ka saya  hai...
kuch yaaden hai usne samet ke samhal rakhhi
un yaadon ko seene se laga wo saansen laya hai...
badi himmat hai uff bhi nahin karta
kisi mitti ne khoob man se usse banaya hai...
wo maula se milne roz jaata hai
buton ko bhi dil me usne sajaaya hai...
kuch bhi ho jaaye
uski fitrat dostaana hi rahi
usne geet dushman ko bhi ‘Bharat’ pyar hi ka sunaaya hai...


वो शख्स अब दुआ नहीं करता
उसकी उमीदों पे नाउमीदी का साया है...
कुछ यादें हैं उसने समेट के सम्हाल रखी
उन यादों को सीने से लगा वो साँसे लाया है...
बड़ी हिम्मत है उफ्फ़ भी नहीं करता
किसी मिट्टी ने खूब मन से उसे बनाया है …
वो मौला से मिलने रोज़ जाता है 
बुतों को भी दिल में उसने सजाया है …
कुछ भी हो जाये
उसकी फ़ितरत दोस्ताना ही रही
उसने गीत दुश्मन को भी ‘भरत' प्यार ही का सुनाया है …

भरत
१७/०२/२०११
नयी दिल्ली

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