21/2/11

insaaniya ki khoj / इंसानियत की ख़ोज

 

बदले वक्त में सच्चा था जो..
एक मासूम बच्चा था वो
वो इब्तिदा से अबरार था
माँ बाप से उसे प्यार था
बहन के दिल का ताज़ था
बच्चों से बेहद दुलार था
भाइयों का हमराज़ था
दोस्तों की आवाज़ था
हम-जवारों को उस पे नाज़ था  *हम-जवार = neighbourhood
हम-पलों का कार-परदाज़ था   *हम-पलों = colleague *कार-परदाज़, accomplisher of a work
वक्त की करवट...
उसे ख्वाबों ने घेरा इस कदर
भटकता है वो दर ब दर...
ख्वाबों को वक्त की क्या कदर
फिरा रहे हैं उसे शाम-ओ-सहर...

जरूरत-ऐ-वक्त से परेशान होना लाज़िम लगे
कशिश-ऐ-वक्त से बदलना लाज़िम लगे
अहससा-ऐ-तगाफ़ुल-ऐ-वक्त से दबना भी लाज़िम लगे  * तगाफ़ुल = negligence
रह गया बस कर हवाले खुद को वो वक्त के अब
वक्त का उस से खेलना भी लाज़िम लगे

ख्वाहिशें भी कब कहाँ आखरी होती हैं
एक से शुरू हुई तो सितारों तक होती हैं
दिमाग का खेल दिल से खेलती हैं
गुल-ऐ-आरमान-ऐ-दिल चुपके से तोड़ती हैं
थकना लाज़िम है
बेचारगी भी लाज़िम है
कहाँ की राते कहाँ की नींदें
मशीनों को भला कहाँ नसीब नींदें

तुम दोस्त हो उसके
तुम उसको बचा लो
तुम उसका होश उसको
कुछ वापस दिला दो

इस अंधे कुँए की रौशनी में
डूब ना जाना
बस इतनी सी है बात
बस इतना सा फ़साना...
शिकार वक्त का ‘भरत’ भी हो गया था 
मिला यार वक्त पर तो बच गया था


Badle Waqt Men Bhi Sachcha Tha Jo..
Ek Masoom Bachcha Tha Wo
Wo Ibtida Se Abarar Tha
Maan Baap Se Use Pyar Tha
Bahan Ke Dil Ka Taj Tha
Bachchon Se Behad Dular Tha
Bhaiyon Ka Hamraaz Tha
Doston Ki Aawaaz Tha
Ham-Javaron Ko Uss Pe Naz Tha *Ham-Javar = Neighbourhood
Ham-Palon Ka Kar-Paradaaz Tha *Ham-Palon = Colleague *Kar-Paradaaz, Accomplisher Of  Work
Waqt Ki Karawat...
Use Khwaabon Ne Ghera Is Kadar
Bhatakta Hai Wo Dar B Dar...
Khwaabon Ko Waqt Ki Kya Qadar
Fira Rahe Hain Use Shaam-O-Sahar...

Zaroorat-E-Waqt Se Pareshaan Hona Lazim Lage
Kashish-E-Waqt Se Badalna Lazim Lage
Ahasasa-E-Tagafaul-E-Waqt Se Dabna Bhi Lazim Lage * Tagafaul = Negligence
Rah Gaya Bas Kar Hawaale Khud Ko Wo Waqt Ke Ab
Waqt Ka Us Se Khelna Bhi Lazim Lage

Khwahishen Bhi Kab Kahan Aakhari Hoti Hain
Ek Se Shuru Hui To Sitaaron Tak Hoti Hain
Dimaag Ka Khel Dil Se Khelti Hain
Gul-E-Aramaan-E-Dil Chupke Se Todati Hain
Thakna Lazim Hai
Bechaaragi Bhi Lazim Hai
Kahan Ki Rate Kahan Ki Neenden
Maseeno Ko Bhala Kahan Naseeb Neenden

Tum Dost Ho Usske
Tum Ussko Bacha Lo
Tum Usska Hosh Ussko
Kuch Wapas Dila Do

Iss Andhe Kunwen Ki Roushni Men
Doob Na Jana
Bas Itni Si Hai Baat
Bas Itana Sa Fasana...

Shikar Waqt Ka ‘Bharat’ Bhi Ho Gaya Tha
Mila Yar Waqt Par To Bach Gaya Tha

5 टिप्‍पणियां:

  1. इस अंधे कुँए की रौशनी में
    डूब ना जाना
    बस इतनी सी है बात
    बस इतना सा फ़साना......वाह बहुत सुन्दर शब्दों का मेल किया है भाई जी ..इंसानियत का अर्थ ही यही है कि अगर दूसरे का दुःख दूर न कर पाओ तो उसके दुःख को आपस में बाँट लो ..पर समय का अभी चक्र ऐसा चला है की या यू कहें की इंसानियत को शर्मसार करता वक्त ने ऐसा पलटा खाया की पत्थर की मूर्ति पिगल रही है कही ..और इन्सान पत्थर होता जा रहा है कही ...बहुत सुंदर नोट भाई जी !!!!!!!!बधाई जी !!!!! Nirmal Paneri

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  2. तुम दोस्त हो उसके
    तुम उसको बचा लो
    तुम उसका होश उसको
    कुछ वापस दिला दो ..

    बहुत ही खूबसूरत रचना ... बहुत शुभकामनायें आपको भरत जी ..

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  3. भारत जी, इस शास्वत खोज पे आपकी ये रचना सुन्दरता से अलंकृत है. मै भी कुछ इस तरह से समझ पाया इस नाटक को:
    मै क्या हूँ ?
    शतरंज का एक मोहरा हूँ,
    कभी मरता हूँ , फिर खडा होता हूँ,
    कभी हंसता हूँ, फिर कभी रोता हूँ,
    सपने में बस ये सभी कुछ करता हूँ.

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  4. जरूरत-ऐ-वक्त से परेशान होना लाज़िम लगे
    कशिश-ऐ-वक्त से बदलना लाज़िम लगे
    अहससा-ऐ-तगाफ़ुल-ऐ-वक्त से दबना भी लाज़िम लगे
    रह गया बस कर हवाले खुद को वो वक्त के अब
    वक्त का उस से खेलना भी लाज़िम लगे.........

    kya baat !!!

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  5. जरूरत-ऐ-वक्त से परेशान होना लाज़िम लगे
    कशिश-ऐ-वक्त से बदलना लाज़िम लगे
    अहससा-ऐ-तगाफ़ुल-ऐ-वक्त से दबना भी लाज़िम लगे
    रह गया बस कर हवाले खुद को वो वक्त के अब
    वक्त का उस से खेलना भी लाज़िम लगे.........

    kya baat !!!

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