15/3/11

Us'ke Aks Se Bahak Jata Hoon / उसके अक्स से बहक जाता हूँ


उसके अक्स से बहक जाता हूँ
उससे रूबरू हो महक जाता हूँ...
उसका दरबार मेरी जन्नत है
जाऊं ना उधर तो थक जाता हूँ ...
उसका मिलना पिघलना मेरा
उसको देख भर दहक जाता हूँ ...
उससे ही मेरी साँसे चलती है
उसकी आहट से चहक जाता हूँ...
उसके पाँव की धुल भी सोना है
उन्ही निशानों पर रुक जाता हूँ...

Us'ke Aks Se Bahak Jata Hoon
Usse Rubaru Ho Mahak Jata Hoon...
Uska Darabaar Meri Jannat Hai
Jaa’oon Na Udhar To Thak Jata Hoon ...
Uska Milna Pighalna Mera
Us’ko Dekh Bhar Dahak Jata Hoon ...
Us’se Hi Meri Saanse Chalti Hain
Us’ki Aahat Se Chahak Jata Hoon...
Us’ke Paanv Ki Dhul Bhi Sona Hai
Unn’hi Nishanon Par Ruk Jata Hoon...


Us'ke Aks Se Bahak Jata Hoon / उसके अक्स से बहक जाता हूँ
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1 टिप्पणी:

  1. उससे ही मेरी साँसे चलती है
    उसकी आहट से चहक जाता हूँ...

    हमेशा की तरह समर्पण भाव से परिपूर्ण आपकी रचना ... बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ... भरत , आपको बहुत शुभकामनायें

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