4/6/11

कृत्या में सात


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एक...
इस शब्द में ही गडबड़ी है
ना जाने किसने सृजन किया
शब्दों की जन्म कुण्डली तो अब बनायीं जाती है
फलां शब्द किसने कब और क्यों कहाँ
और बाकी के ना जाने क्या क्या ब्योरे
‘इन्तेजार’ शब्द की बात कर रहा हूँ
जब से पैदा हुआ होगा
किसी को नहीं बक्शा
सृष्टि के बाद भी ये नहीं जायेगा...

दो...
तुम और मैं
साथ हुआ करते थे
दिन के हर पहर में खुश
तब हमेशा के किये जन्मों का साथ था
याद है पीर बाबा की मज़ार से वापसी
तुमने या फिर शायद मैंने कहा था
सात जन्मो का साथ माँग लिया है !
वो धागा अब भी “इन्तेज़ार” करता होगा
उसका भी और तुम्हारा मेरा भी रंग लाल था
रिश्ते खून के रंग से नहीं बनते, उसे क्या मालूम
“इन्तेज़ार” तो हम भी करते ही रहेंगे
उन दिनों का जो अब नहीं आयेगें
“इन्तेज़ार” साहेब आप भी कमाल के हैं उम्मीद की डोर को टूटने नहीं देते आप


तीन...
त्योहारों का “इन्तेज़ार”
कमाल का काम करता है
रगों में खून की दौड़ को बढाता रहता है
होली कब की है ज़रा देखना कैलेण्डर
होली है !
फिर वीरान गलियाँ
वो करती हैं “इन्तेज़ार”
कब अगला साल आएगा और फिर से वो लाल हरी बैगनी पीले रंगों से रंग जायेंगी
मेरे सारे त्यौहार तो तुम ही हो, कब आओगे


चार...
इस ड्राइवर का क्या करूँ
कामवाली समझती ही नहीं
अभी तक अखबार नहीं डाल गया
माथे पर दो रेखाएँ तो इन्होने ही पक्की करी हैं
इनके ‘इन्तेज़ार’ में एक बड़ी अच्छी बात होती है
इन्तेज़ार खत्म होने के पाँच सात मिनट बीते
हम भूल जाते है कि अभी थोड़ी देर पहले किस मनोस्थिति में थे
ज़िंदगी वापस अपनी रफ़्तार को पकड़ के भगा ले जाती है हमें
बाकी के ‘इन्तेज़ार’ कर रहे होते हैं हमारा ‘इन्तेज़ार’
और मैं तुम्हारा हमेशा की तरह...

पाँच..
तुम ने एक बार मुझे छुआ है
ऊँगली की पोर से
उस हिस्से भर से जिससे गिटार का तार
धुन अधूरी है
एक सुर भर था वो स्पर्श
जिंदगी के गीत को “इन्तेज़ार” है तुम्हारे अनगिनत स्पर्शों का

छः...
तुमको पत्र लिखना
टूटे फूटे लेकिन दिल की बात कहते शेर
कागज़ से भरी कमरे की फर्श
शाम से हुई सुबह
तुम तक उसको पहुचाना
गणित के सारे समीकरणों से मुश्किल
फिर एक लंबा “इन्तेज़ार”
शायद इन्ही सारी प्रक्रियाओं से तुम्हे भी गुजरना होता होगा
आखरी पत्र का “इन्तेज़ार” नहीं गया अब तक और अजीब भी नहीं लगता

सात...
घर पास होता था
बारिश की बूंदे शुरू होते ही
साइकिल पे सवार भीग रहा मैं
तुम छत पे सावन मनाते थे
दूर हो के भी हम साथ भीग लिया करते थे
दूरी देश की सीमा लाँघ गयी
उम्र समय की
बारिश अब साथ नहीं होती
छत और साईकिल को “इन्तेज़ार” है
उनकी खातिर ही कभी भीगते हैं एक बार और कभी


http://kritya.in/0612/hn/poetry_at_our_time.html

13 टिप्‍पणियां:

  1. Wah Wah Kya Baat hain.... Bahut hi achi rachna Bhai !!!

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  2. “इन्तेज़ार”,,,,,,,,,,,,,,, “इन्तेज़ार”,,,,,,,,,,,,,,,और ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, “इन्तेज़ार”,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,वाकई कमाल का है ये “इन्तेज़ार”..!!!!

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  3. एक...
    इस शब्द में ही गडबड़ी है
    ना जाने किसने सृजन किया
    शब्दों की जन्म कुण्डली तो अब बनायीं जाती है
    फलां शब्द किसने कब और क्यों कहाँ
    और बाकी के ना जाने क्या क्या ब्योरे
    ‘इन्तेजार’ शब्द की बात कर रहा हूँ
    जब से पैदा हुआ होगा
    किसी को नहीं बक्शा
    सृष्टि के बाद भी ये नहीं जायेगा...

    bahut sundar though. Dheerendra

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  4. Bharat....Inte'zaar.....zindagi ki har dhadkan ki tarah hai...ek lee to doosri ka intezaar.....sach tumne har prasang mein...chu liya man ko....yeh kavita nahi...mansthitiyon ki tasveerey hain.....har bimb..zahan mein atak jata hai..aur majboor kar deta hai..tithak kar sochne ko......jiyo mere bhai...aashish...is pratibha ko prabhu ka poorn aashirwad miley.

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  5. बेनामी9:49 am, जून 06, 2011

    भरत जी आपकी कविताएं पढ़ीं। अच्छी लगीं कविताएं।एक इंतजार में कई इंतज़ारों की छवियां अच्छी हैं
    मुकेश मानस

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  6. Dnt hv words to express myself...y r simply superb bharat....god bless u...

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  7. भरत जी
    .आपकी अनेकानेक कवितायेँ .ग़ज़लें ..पढ़ चुकी हूँ,अलग -अलग जगह...यूंतो सभी बहुत अच्छी लगतीं रहीं हैं ..कई बार कहीं कहीं कुछ दोष भी लगे ...पर वास्तव मैं इन सातों रचनाओं की एक दूसरे से तारतम्यता...इन का कथ्य बहुत अलग है.....सुन्दर रचनाओं के रचनाकार को बहुत-बहुत बधाई...!!

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  8. भरत जी ...आपकी अनेकानेक कवितायेँ .ग़ज़लें ..पढ़ चुकी हूँ,अलग -अलग जगह,यूंतो सभी बहुत अच्छी लगतीं रहीं हैं ..कई बार कहीं कहीं कुछ दोष भी लगे ...पर वास्तव मैं इन सातों रचनाओं की एक दूसरे से तारतम्यता...इन का कथ्य बहुत अलग है.....सुन्दर रचनाओं के रचनाकार को बहुत-बहुत बधाई...!!

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  9. भरत जी ...आपकी अनेकानेक कवितायेँ .ग़ज़लें ..पढ़ चुकी हूँ,अलग -अलग जगह,यूंतो सभी बहुत अच्छी लगतीं रहीं हैं ..कई बार कहीं कहीं कुछ दोष भी लगे ...पर वास्तव मैं इन सातों रचनाओं की एक दूसरे से तारतम्यता...इन का कथ्य बहुत अलग है.....सुन्दर रचनाओं के रचनाकार को बहुत-बहुत बधाई...!!

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  10. wow wow wow... SUPERB INTEZAAR BHAI EK UMEED BHI KAHIN NIRASHAA BHI, MAGAR HAI INTEZAAR EK NAYI AASHA..

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  11. देर से आया मगर दुरस्त आया...भरतजी न आता तो वंचित रह जाता...डॉ. भावनाजी से सहमत होते हुए कहूँगा...इनमें कुछ नयापन व ताज़गी है...

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  12. Bharat...saat sthitiyaan.....intezaar ki ladiyaan gunthi hui....ek alag acchi koshish...pasand aayee.

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  13. Bharat....intezaar ke itne rang...ek nayaa andazz....accha laga/...jiyo....

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