9/6/11

समुंद्र मंथन … नरेन्द्र व्यास

narendra vyas - kabhi kabhi sonchta hoon

छाया चित्र : इंटरनेट से

Dinesh Choubey 

नरेंद्र भाई... बिना सांस लिए पूरी कविता पढ़ गया..इतनी गति है इसमे...
कितने गहरे शब्द इस्तेमाल किए हैं जैसे बलुआ देह...

15 टिप्‍पणियां:

  1. समुद्र से बातें , स्व से मंथन और एकाकार होने की प्रबलता .... इस रचना की उत्कृष्टता हर किसी के मन में उतरेगी - शुभकामनायें, आशीष ...

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  2. नरेंद्र भाई क्या कहूँ....आपके शब्दों का गणित सिमित है पर अथाह अर्थ समेटे हुए है..."बलुआ देह " जेसे शब्द मन के गहरे तक रचना का अर्थ समा लेते है ....बधाई

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  3. नरेन्द्र जी,
    कविता की गति और गहराई तक जाना यानी बालू से भरे रेगिस्तान की तह तक जाकर सदियों पहले उसके गर्भ में बहती नदी को पुन: जीवित करके
    उसकी नमीं को इस हवा में से बदरी का रूप देना और फिर उसी बदरी को बरसाकर उसी सदियों पुरानी बहती नदी के बहाव के मधुर संगीर के साथ सही ताल मिलाना... अद्वितीय कल्पना ज़रूर हैं मगर सत्य के बहुत ही करीब | क्योंकि यह पूरी प्रक्रिया सिर्फ कल्पना, मानसिक सोच-विचार के साथ जुडी होने के बावजूद वैज्ञानिक अभिगम से करीब भी है और सत्य के आधार पर भी...!
    सेंकडों कवितायेँ पढ़ने के बाद बड़ी मुश्किल से ऐसी अद्वितीय कविता पढ़ने को मिलाती हैं, जो सच में अपने साथ पाठक को अपने शब्दों की ऊंगली पकड़कर ले जाती हैं और उसी अहसास का सीधा अनुभव भी कराती हैं | मेरी बधाई स्वीकार करें और आगे भी आपकी यात्रा यही चरम तक पहुँचती रहें |

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  4. आप सब गुणीजनों के समक्ष नतमस्तक हूँ, आभारी हूँ और नमन करता हूँ. आपका स्नेहिल मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिलता रहे, मेरे लिए सबसे बड़ी थाती होगी.
    खासकर भरत जी के स्नेह के समक्ष मेरे शब्द श्रीहीनता के उत्तुंग शिखर के आख़िरी छोर तक जाकर ठिठक गए हैं.. बस नमी लिए चक्षु प्रत्यक्ष सृष्टा के समक्ष नतमस्तक हैं.. नमन !

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  5. नमस्कार !
    भरत जी , नरेन्द्र जी !
    मेरा सौभाग्य है कि नरेन्द्र जी को निजी तौर पे भी जानता हूँ और उनकी लेखनी में संभावना शील रचनाकार है . एक बिम्ब उभरता है जहा अक्सर रेगिस्तान कि मखमल बदन को ले किसी मासूक को इंगित किया जाता है वही कवि देखना चाहता है '' तुम्हारे गर्भ में /बहती उस नदी के /लरजते उस बहाव को सूनु/ '' वाकई एक सूक्ष्म दृष्टी से अथाह गहराई में रचनाकार पहुचा हुआ है एक लय लिए ! बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !बधाई !
    सादर !

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  6. कृष्ण बजगाईं8:22 pm, जुलाई 07, 2011

    बहुत प्रभावशाली कविता !
    कृष्ण बजगाईं
    बेल्जियम

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  7. समुन्द्र मंथन की तरह ये रचना आत्म मंथन करा गई, और सोच के विस्तार के साथ हीं अद्भुत एहसास धीमे धीमे मन में समा गया. बहुत सुन्दर रचना, बधाई नरेन्द्र जी.

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  8. अद्भुत रचना..कितना गहरे उतार देती है अपने साथ साथ.....बहुत उम्दा!!

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  9. ‘सारा सार तुम्हारा’ और ‘बलुआ देह’ जैसे शब्द-चयन के प्रति सतर्कता, सम्पूर्णत्व के सम्प्रेषण हेतु पंचतत्व व इन्द्रियबोध की गरिमा का सार्थक निर्वाह !

    शृंगार को यों ही उज्ज्वल रस नहीं कहा गया है ! कितना उजास है इसमें ।
    बन्धु नरेन्द्र की कलम से ऐसी मायावी कविताएँ अभी और भी आनी शेष हैं । बधाई !!

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  10. नरेन्द्र भाई कुछ अछूते शब्द और अनूठे भाव मिले हैं आपकी इस अप्रतिम रचना में...मेरी बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  11. भाई नरेन्द्र,आप की कविता भीतर तक मन्थन करवा गई |
    बधाई |

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  12. बेहद गहरे भाव से भरी कविता।
    लेकिन 'और' शब्‍द का बार बार उपयोग कविता के प्रवाह को बाधित करता है। उसे हटाकर आप स्‍वयं कविता को पढ़कर देखें। कविता तब भी संपूर्ण लगेगी और ज्‍यादा प्रभावी।

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  13. आप समस्त गुणीजनों का दिल से आभार मेरी एक छोटी सी रचना को फलक देकर मुझे जो सम्मान प्रदान किया, आप सभी को नमन करता हूँ. भाई भारत जी का मैं दिल से शुक्रगुजार हूँ. उनको मेरा शत-शत नमन !

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  14. priya narendra jee aapki chhoti si kavita gehre arthon se sajii kisi ko bhee moh lene ki taakat rakhti hai, is sundar kavita ke liye badhai.

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