17/6/12

Kya kaha jaaye ! क्या कहा जाये

सियासत से बच न पायी
खबरनवीसों की खुदायी 

हाथ जिसके कलम थमायी 
उसने सच को आग लगायी 

हुक्मरां के खून की अब 
लालिमा है धुन्धलायी 

ना चढ़े अब कोइ कालिख 
पर्त ज़र की रंग लायी  

नाम-ए-धर्म के खिलौने 
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई 

वक्त की कहते खता वो
ले रहे जैसे जम्हाई 

देश का प्रेमी बना वो 
इक मुहर नकली लगायी 

सोन चिड़िया फ़िर लुटी है
सब विभीषण हुए भाई 

चोर की दाढ़ी जिगर में 
अब ‘शजर सब ने छुपाई
सादर भरत तिवारी, नई दिल्ली, १७.०६.१२.

10 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य है तभी सुंदर है.
    भरत जी की इस रचना ने समाज के बुद्धिमान नाम के जानवरों पे तगड़ा झटका मारा है. ऐसा काम वास्तव में कोई ऐरा-गैरा नथू-खेरा नहीं कर सकता. कलम के सिपाही जिस दौर में बंधुवा मजदूर हो ऐसे समय में भरत साहब जैसे रचनाकारों की अहम् जरूरत समाज को है.
    विभीषणों के रहते हुए महाशक्ति बन पायेगा भारत इसमें संशय गज़ब का है. इक्कीश्वीं सदी के आरम्भ के दशक कोई तीर नहीं मार पाए हैं. आठ साल में कौन से तीर मार लेंगे इन विभिषनों के सहारे.
    देशप्रेमी के मुखोटों का अस्तित्व बाज़ार वाद में है......हरेक चीज़ को नफ़ा-नुक्सान से तोला जाता है. कर्म के बजाए फल की चिंता ज्यादा बनती जा रही है.


    "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    -----------------
    =======बहुत शानदार रचना है===========

    उत्तर देंहटाएं
  2. सत्य है तभी सुंदर है.
    भरत जी की इस रचना ने समाज के बुद्धिमान नाम के जानवरों पे तगड़ा झटका मारा है. ऐसा काम वास्तव में कोई ऐरा-गैरा नथू-खेरा नहीं कर सकता. कलम के सिपाही जिस दौर में बंधुवा मजदूर हो ऐसे समय में भरत साहब जैसे रचनाकारों की अहम् जरूरत समाज को है.
    विभीषणों के रहते हुए महाशक्ति बन पायेगा भारत इसमें संशय गज़ब का है. इक्कीश्वीं सदी के आरम्भ के दशक कोई तीर नहीं मार पाए हैं. आठ साल में कौन से तीर मार लेंगे इन विभिषनों के सहारे.
    देशप्रेमी के मुखोटों का अस्तित्व बाज़ार वाद में है......हरेक चीज़ को नफ़ा-नुक्सान से तोला जाता है. कर्म के बजाए फल की चिंता ज्यादा बनती जा रही है.


    "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    -----------------
    =======बहुत शानदार रचना है===========

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  3. सत्य है तभी सुंदर है.
    भरत जी की इस रचना ने समाज के बुद्धिमान नाम के जानवरों पे तगड़ा झटका मारा है. ऐसा काम वास्तव में कोई ऐरा-गैरा नथू-खेरा नहीं कर सकता. कलम के सिपाही जिस दौर में बंधुवा मजदूर हो ऐसे समय में भरत साहब जैसे रचनाकारों की अहम् जरूरत समाज को है.
    विभीषणों के रहते हुए महाशक्ति बन पायेगा भारत इसमें संशय गज़ब का है. इक्कीश्वीं सदी के आरम्भ के दशक कोई तीर नहीं मार पाए हैं. आठ साल में कौन से तीर मार लेंगे इन विभिषनों के सहारे.
    देशप्रेमी के मुखोटों का अस्तित्व बाज़ार वाद में है......हरेक चीज़ को नफ़ा-नुक्सान से तोला जाता है. कर्म के बजाए फल की चिंता ज्यादा बनती जा रही है.


    "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    -----------------
    =======बहुत शानदार रचना है===========

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  4. सत्य है तभी सुंदर है.
    भरत जी की इस रचना ने समाज के बुद्धिमान नाम के जानवरों पे तगड़ा झटका मारा है. ऐसा काम वास्तव में कोई ऐरा-गैरा नथू-खेरा नहीं कर सकता. कलम के सिपाही जिस दौर में बंधुवा मजदूर हो ऐसे समय में भरत साहब जैसे रचनाकारों की अहम् जरूरत समाज को है.
    विभीषणों के रहते हुए महाशक्ति बन पायेगा भारत इसमें संशय गज़ब का है. इक्कीश्वीं सदी के आरम्भ के दशक कोई तीर नहीं मार पाए हैं. आठ साल में कौन से तीर मार लेंगे इन विभिषनों के सहारे.
    देशप्रेमी के मुखोटों का अस्तित्व बाज़ार वाद में है......हरेक चीज़ को नफ़ा-नुक्सान से तोला जाता है. कर्म के बजाए फल की चिंता ज्यादा बनती जा रही है.


    "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    -----------------
    =======बहुत शानदार रचना है===========

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  5. सत्य है तभी सुंदर है.
    भरत जी की इस रचना ने समाज के बुद्धिमान नाम के जानवरों पे तगड़ा झटका मारा है. ऐसा काम वास्तव में कोई ऐरा-गैरा नथू-खेरा नहीं कर सकता. कलम के सिपाही जिस दौर में बंधुवा मजदूर हो ऐसे समय में भरत साहब जैसे रचनाकारों की अहम् जरूरत समाज को है.
    विभीषणों के रहते हुए महाशक्ति बन पायेगा भारत इसमें संशय गज़ब का है. इक्कीश्वीं सदी के आरम्भ के दशक कोई तीर नहीं मार पाए हैं. आठ साल में कौन से तीर मार लेंगे इन विभिषनों के सहारे.
    देशप्रेमी के मुखोटों का अस्तित्व बाज़ार वाद में है......हरेक चीज़ को नफ़ा-नुक्सान से तोला जाता है. कर्म के बजाए फल की चिंता ज्यादा बनती जा रही है.


    "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    -----------------
    =======बहुत शानदार रचना है===========

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  6. सत्य है तभी सुंदर है.
    भरत जी की इस रचना ने समाज के बुद्धिमान नाम के जानवरों पे तगड़ा झटका मारा है. ऐसा काम वास्तव में कोई ऐरा-गैरा नथू-खेरा नहीं कर सकता. कलम के सिपाही जिस दौर में बंधुवा मजदूर हो ऐसे समय में भरत साहब जैसे रचनाकारों की अहम् जरूरत समाज को है.
    विभीषणों के रहते हुए महाशक्ति बन पायेगा भारत इसमें संशय गज़ब का है. इक्कीश्वीं सदी के आरम्भ के दशक कोई तीर नहीं मार पाए हैं. आठ साल में कौन से तीर मार लेंगे इन विभिषनों के सहारे.
    देशप्रेमी के मुखोटों का अस्तित्व बाज़ार वाद में है......हरेक चीज़ को नफ़ा-नुक्सान से तोला जाता है. कर्म के बजाए फल की चिंता ज्यादा बनती जा रही है.


    "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    -----------------
    =======बहुत शानदार रचना है===========

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  7. "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    khoobsoorat...soch....khoobsooratbayaan

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  8. "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    Waaaaahhhhh khoobsoorat khayal khoobsoorat bayaan

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  9. "हाथ जिसके
    कलम आई
    उसी ने सच को
    आग लगाई"
    khoobsoorat...soch....khoobsooratbayaan

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  10. बहुत सार्थक और सटीक प्रस्तुति...

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