23/8/12

yeh kaisa mousam bana rahe ho یہ کیسا موسم بنا رہے ہوو ये कैसा मौसम बना रहे हो

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ये कैसा मौसम बना रहे हो  
गुलों में दहशत उगा रहे हो
धरम को पासा बना रहे हो 
ये खेल कैसा खिला रहे हो 
खुद तो घुटनों पे चल रहे हो 
सम्हलना हमको सिखा रहे हो
ज़मीर जाहिल बना हुआ है
ये इल्म कैसा सिखा रहे हो
हक़ तो ये है तुम आज नाहक़
गुलों पे ये हक़ जमा रहे हो
खुली हैं आँखें ‘शजर’ है जिंदा 
क्यों अपनी शामत बुला रहे हो 
yeh kaisa mousam bana rahe ho
guloN meN dahshat uga rahe ho 
dharam ko paasaa bana rahe ho
yeh khel kaisaa  khilaa rahe ho 
khud to ghutnoN pe chal rahe ho
samhalna hamko sikha rahe ho 
zameer jaahil banaa hua hai
ye ilm kaisaa sikhaa rahe ho 
haq to ye hai tum aaj na-haq
guloN pe ye haq jama rahe ho 
khuli haiN aaNkheN ‘Shajar’ hai ziNda
kyoN apni shamat bula rahe ho 
یہ کیسا موسم بنا رہے ہو
گلوں میں دہشت اگا رہے ہو
دھرم کو پاسا بنا رہے ہو
یہ کھیل کیسا کھلا رہے ہو
خود تو گھٹنوں پہ چل رہے ہو
سنبھلنا  ہم کو سکھا رہے ہو
ضمیر جاہل بنا ہوا ہے
یہ علم کیسا سکھا رہے ہو
حق تو یہ ہے  تم آج نا حق
گلوں پہ یہ حق جما رہے ہو
کھلی ہیں آنکھیں
Urdu translation by dear friend Samina Mir 

19/8/12

सिसिफस : अरुण देव

2 टिप्‍पणियां:
अरुण देव की कविता "सिसिफस: पढ़ कर बस ये हुआ कि बात करी जाये कवि से , करी, फ़िर रोक ना पाया इसे यहाँ प्रकाशित करने से ~
आप भी आनन्द उठायें  ... सादर भरत तिवारी
धूप उठी
और उठ कर बैठ गयी
नीद मेरी सोई पड़ी रही 

उस पर भार था एक पत्थर का
जिसे ले चढता उतरता था मैं रोज

मेरी नीद से
न जाने कहाँ चले गये महकती रातरानिओं के वे फूल
जिनसे बिधा रहता था मेरा दिन
कोई पुकार बजती रहती थी मेरे कानो को
जल के हिलते विस्तार से तारों की टिमटिमाती हुई

मेरी नीद पर खटखट नहीं करता अब
ओंस से भीगा वह हरा पत्ता
जो अभी भी अंतिम आकर्षण है
इस सृष्टि का
और सृष्टि किसी शेष नाग पर नहीं
इसी की नोंक पर टिकी है

मेरी नीद के जगने से पहले
उठ बैठती थी चिडिओं की चहचहाहट
नदी से लौटी हवा के गीले केश
बिखरे रहते थे मेरे गालों पर 

निरर्थक दिनचर्या की जंजीरों में जकड़ा
न जाने किस दलदल में
घिर गया हूँ मैं

एक ही रास्ते से आते-जाते
जैसे सारे रास्ते बंद हो गये हों

कौन बधिक है यह
जिसके जाल में फंस गया है मेरा दिन
और जिसके जंजाल में उलझ पड़ी हैं मेरी रातें.

13/8/12

ज़िंदगी का पता Zindagi ka pata

2 टिप्‍पणियां:

ज़िंदगी वहीँ खड़ी थी
दिल ओ दिमाग के बींचोबीच
नज़रों ने उसे
दिमाग से तलाशा
और बोलीं
कि "गुम हो गई कहीं "

इतवार की भरी सुबह
जो आँख खुली
ज़िंदगी साँस लेती दिखी
खिड़की से सूरज
धार बन अंदर आ रहा था
मुस्कुराती इतराती ज़िंदगी
ज़र्रों में चमक रही थी

मेरे पूछने पर
कहाँ थी
बोली -
"मुझे दिल की आँखों से देखा करो –

मैं तुम्हारे अंदर बायीं तरफ़ रहती हूँ”
                                                                                              :शजर
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Zindagi wahin khadi thi
Dil O dimaag ke beechon'beech
Nazron ne usse
Dimag se talasha
Aur bolin
Ki "gum ho gayi kahin"

Itvaar ki bhari subah
Jo aankh khuli
Zindagi saans leti dikhi
Khidki se sooraj
Dhaar ban andar aa raha tha
Muskuraati itraati zindagi
Zarr'on me chamak rahi thi

Mere poochne par 
Kahan thi
Boli -
"Mujhe Dil ki aankhon se dekha karo -

Main tumhare anda baayin taraf rahti hoon"
                                                                                              :Shajar

11/8/12

But I still love you

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bharat tiwari, new delhi


Won't say you are liar
But we both know you are
I never had big wings
Always thought they will grow
And when they were to bloom
You chopped them off
I knew I am in the cage
But never believed
Won't say you are liar
But we both know you are
You left me alone
Trapped in the cage
I could not walk
And i miss my wings
But i still love you
And i know you too

Won't say you are liar
But we both know you are




5/8/12

आ मिला हाथ aa mila haath

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आ मिला हाथ  
दोस्ती के नाम
बचा है
बस एक संडे
और हफ्ता कोई एक नाटक सा 

जाने कब दोस्ती ने साथ पतंग उड़ाना छोड़ा
कबूतरों के दड़बे ही उड़ गए
कंचे को मिली टेबल सजाने की सज़ा 
आइस-पाईस तो सच की ही बन गयी
नजर ही नहीं आते 
टीप किस को मरोगे

... अरे यार दिल खुश हो गया मिल के आज तुमसे !
(अभी दस मिनट भी नहीं बीते)
बड़ा कमीना हो गया है 
ऐसा था नहीं 
(खुद को नहीं देखा)
और साथ ...
दस साल साथ बड़े हुए
तब
दिवाली बीती नहीं के
होली की याद आना शुरू

...अरे यार अब मजा नहीं रहा होली दिवाली में !
अब 
एस एम एस से खेलो
होली
दिवाली
ईद की सेवईं
दोस्ती की मिठास

वो अब दोस्त नहीं रहा !
पैमाना... 
एक  एस एम एस भी नहीं करता

दोस्ती क्या बस अगस्त का पहला हफ्ता है
या फिर
जिंदगी है ये
जीना हो तो एक हफ्ते जियो

हम तो भाई सारी उमर जियेंगे…
अपनी अपनी जिंदगी है
अपना अपना राग
भरत ०१/०८/२०१०

Aa mila haanth
Dosti ke naam
Bacha hai 
Bas ek sunday
Aur hafta koi ek natak sa

Jaane kab dosti ne saath patang udana chhoda
Kabootaron ke dad’bey hi udd gaye
Kanche ko mil table sajane ki saza 
Aais-paais to sach ki hi ban gayi
Nazar hi nahin aate 
Teep kis ko maroge

... Are yaar dil khush ho gaya mil ke aaj tumse !
(abhi das minute bhi nahin beete)
Bada kameena ho gaya hai
Aisa tha nahi
(khud ko nahi dekha)
Aur saath…
Das saal saath bade hue
Tab
Diwali beeti nahin ke
Holi ki yaad aana shuru

...arre yaar ab maja nahin raha holi diwali men !
Ab 
Sms  se khelo
Holi
Diwali
Eid ki sevain
Dosti ki mithaas

...vo ab dost nahi raha
Paimana
Ek sms bhi nahin karta

Dosti kya bas august ka pahla hafta hai 
Ya fir
Zindagi hai ye
Jeena ho to ek hafte jiyo

Ham to bhaai saari umar jiyenge…
Apni apni zindagi hai
Apna apna raag
Bharat 01/08/2010
Happy Friendship Day
हैपी फ्रेंडशिप डे

(7 अगस्त 2011 नवभारत टाइम्स में प्रकाशित navbharattimes.indiatimes.com Published in Navbharat Times on 7 Aug 2011) 

4/8/12

गाथा

2 टिप्‍पणियां:
भरत तिवारी शजर युवा हिंदी उर्दू कवि शायर bharat tiwari shajar young hindi urdu poet गाथा 
-----------------
तब तक ऐसा लगता रहता था 
कि कोई शायद दरवाज़े पर सांकल छूने को है
कोई ना कोई आ मरेगा

आती तो सिर्फ तुम ही थी
क्यों ये अहसास तब ही तक बैठा रहता था 
जब तक तुम 

तुम तो जानती ही थी
कि किवाड़ खुला होगा
कभी दस्तक दी भी नहीं इसीलिए शायद 
बस आ जाती थी 
“दरवाज़ा बंद रखा करो” और चिटकनी लगा देती थी

कहाँ गये सुबह के वो बीस मिनट
ब्लैक कॉफी
एक्वेरियम से तुम्हारी गोल्ड फ़िश और मेरी ब्लैक मूर
उनकी सात मोटी गोल आँखों के जोड़े 
और तुम 

ये बताने के लिए लिखा इतना सब कि 
अब तुम आओगी तो दस्तक देनी पड़ेगी
... कि मैंने दरवाज़ों को बंद कर रखा है 
जो सिर्फ तुम्हारे लिये ही खुलेंगे 
...कि दस बरस से ऊपर हो गये
उन बीस मिनटों से मिले हमें

mere hisse ka shayar मेरे हिस्से का शायर

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mere hisse me jo ik ye
shayar aaya hai /
kahta hai ke ye duniya
bas “waqt ka saya” hai /
thaam leta hai vo har baar
mujhe doobne se pahle
kahta hai ghar khuda ne ik
tujh me banaya hai /
doston me kami dekhoon
to vo naraz hota hai
kahta hai ab taq apna tha
ab kaise paraya hai /
jo baaten uski mai pahle
nazar-andaz karta tha
kahta hai ab naa karna fir
har agla pal paraya hai ///      shajar

1/8/12

लड़ाई / ladai

8 टिप्‍पणियां:

Roushni ki lau
Andhere ko hata to deti hai
Lekin
Haar jaati hai thak kar
Aur kho jaati hai
Ussi andhere me
Naa jaane kahan gum ho jaati hai
… andhera bahut kaala bahut gahra aur bahut bada hota hai
shajar


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