29/12/13

इबादत — भरत तिवारी

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इबादत — मैं जा रहा हूँ मंदिर बनाने — भरत तिवारी । #BabriMasjid #ShauryaDiwas

मैं जा रहा हूँ मंदिर बनाने।
अब बहुत व्यस्त रहूँगा।

देश को तोड़ कर पत्थर इकट्ठे करने हैं,
कुछ बच्चे चाहिए होंगे,
पत्थरों को तर्शवाना होगा।
सबसे ज्यादा ज़रूरत इसे मजबूत बनाने की है.
इतना मजबूत -
कि ...
कोई तोड़ ना सके।
बुर्ज पर चाँद की रौशनी ना पड़े ये भी देखना है।

मजबूती कैसे लायी जाये - हल मिल गया है।
खून के रिश्ते,
और उनके रिश्तों के रिश्ते,
सब को बुलाना है,
जोड़ का शक्तिशाली मसाला बनाने के लिए।

मसाला बनाना कोई मजाक नहीं है,
एक-छः का मजबूत मसाला !
एक हिस्सा बचे लोगों का खून
और छः हिस्सा हड्डीयां।

बहुत काम करना है - इबादत करना अब आसान नहीं रहा ...

#BharatTiwari

9/12/13

उम्मीद का कुआँ

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उम्मीद का कुआँ 
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उम्मीद के कुँए की खुदाई हो रही है,
जिस ज़मीन का खून चूसा जा चुका है...
उसी के अन्दर कई जगह गड्ढे खुदे दिख रहे हैं
खोदाई करने वालों के अलग-अलग गुट, 
अलग-अलग सुरक्षा के उपाय उनके
प्लास्टिक, लोहे, कागज़, कपडे की टोपी पहने 
                                                  ये लोग
सब खुदाई में व्यस्त दिख रहे हैं
उधर दूर एक गुट है, बड़ा गुट है , सबसे बड़ा
वो खुदाई नहीं कर रहा -
क्योंकि उस ने ही ज़मीन बंजर बनाई है
लेकिन वो कह रहा है - हमें ही पता है... 
आपकी प्यास, आपकी भूख कैसे मिटायी जाती है

उम्मीद है कि प्यासे खड़े लोग उसकी बात नहीं बाकियों के गड्ढे
                                                  और उसकी गहराई देखेंगे

तेल-पानी की जगह उम्मीद निकलेगी, ये उम्मीद है


7/9/13

कविता : टेल-बोन

1 टिप्पणी:
टेल-बोन
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चीख तो सब ने सुनी थी
समझी शायद ही किसी ने
चीख को शोर कह,
कानों पर हाथ रख लिए।
बोले नौटंकी है,
आंखें फेर बहुत दूर चले गए नजरों से 
दरवाज़े-खिड़कियां धड़-धड़ करके खुले
चूं चूं की आवाज़ के साथ धीरे से बंद होते गए,
मानो फुटबॉल मैच में मैक्सिकन-तरंग।
चूं चूं की आवाज़ दरवाजे से नहीं,
उसके पीछे एक-पर-दूसरे चेहरे की नहीं
डरपोकपन की होती है।
मनहूसियत और डरपोकपन  साथ-साथ रहते हैं – मरण-मरण का साथ ।

चीख की भाषा समझने के लिए
हटाने पढ़ते हैं,
कानों में लगे दर्द-को-पहुँचने-से-रोकने-वाले फिल्टर।
जिंदा करनी पड़ती है रीड़ की वो-नस
जो आँखों का देखा, देख
नहीं मुड़ने देती गर्दन दूसरी तरफ।
रीड़ की नसों को इतना ना मारा जाए
कि प्रकृति उन्हें टेल-बोन बना दे।
#BharatTiwari

15/8/13

क्या करें | کیا کریں |kya kareN | #ghazal | #ग़ज़ल | غزل#

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इन हुक्मरानों पर ज़रा सा भी भरोसा क्या करें
इनको खबर खुद भी नहीं, कब ये तमाशा क्या करें

शर्म ओ हया से दूर तक, जिसका न हो कुछ वास्ता 
वही आबरू-ए—मुल्क का, जब हो दरोगा क्या करें

इक नौकरों का शाह है, इक बादशाह बेताज़ है 
दोनों का मकसद लूटना, अब बापदादा क्या करें

काला बना पैसा हमारा, भेज दे स्विस बैंक में
रोया करें हम प्याज को, खाली खजाना क्या करें

नाटक दिखाते हैं तुझे, सब टोपियों का खेल है
सब के इरादे एक से, बस अब इशारा क्या करें
- भरत

ان حکمرانوں پر ذرا سا بھی بھروسہ کیا کریں 
ان کو خبر خود بھی نہیں، کب یہ تماشا کیا کریں 

شرم و حیا سے دور تک، جن کا نہ ہو کچھ واسطہ 
وہی آبرو ملک کا، جب ہو دروغہ کیا کریں 

اک نوکروں کا شاہ ہے، اک بادشاہ بےتاج ہے 
دونوں کا مقصد لوٹنا، اب باپ-دادا کیا کریں 

کالا بنا پیسا ہمارا، بھیج دیں سوئس بینک میں 
رویا کریں ہم پیاز کو، خالی خزانہ کیا کریں 

ناٹک دکھاتے ہیں تجھے، سب ٹوپیوں کا کھیل ہے 
سب کے ارادے ایک سے، بس اب اشارہ کیا کریں 
بھرت -

in huqmranoN par zara sa bhi bharosa kya kareN
inko khabar khud bhi nahi, kab ye tamasha kya kareN

sharm o haya se door tak, jinka na ho kuch wasta
vahi aabroo e mulk ka, jab ho daroga kya kareN

ik noukaroN ka shah hai, ik badshah betaj hai
dono ka maqsad lootna, ab baap-dada kya kareN

kala bana paisa hamara, bhej deN swiss bank meN
roya karen ham pyaj ko, khali khajana kya kareN

natak dikhate hain tujhe, sab topiyoN  ka khel hai
Sab ke iraade ek se, bas ab ishara kya kareN
-Bharat

5/8/13

आप के घर का पता रखता हूँ अब #Ghazal #BharatTiwari

2 टिप्‍पणियां:
आप के  घर  का  पता रखता हूँ अब
बस के इतनी  ही खता करता हूँ अब

बंद गलियाँ बन  गयी  हैं  घर  मिरा
रात का  साया  बना  फिरता  हूँ अब

वो  परिंदा  मर  गया  उड़ता  था  जो
पर  ये  मुर्दा  हैं के  जो  रखता हूँ अब

आप  के  आने  कि  जो  उम्मीद  है
साथ  उसके  टूट  कर  मरता हूँ अब

एक   मूरत  है   औ  इक  तस्वीर  है
बस  उन्ही  से  बात  मैं करता हूँ अब

इश्क  की   पाकीज़गी   जाने  'भरत'
इश्क  से ही  बस  के वाबस्ता हूँ अब

7/7/13

हो गया खूँखार अब तो हर शहर #ghazal | #ग़ज़ल | غزل#‎

2 टिप्‍पणियां:

हो   गया   खूँखार  अब  तो   हर  शहर
फितरतों  में   घुल   गया  ऐसा  ज़हर

देखते   हैं   सब   तमाशा   बस   यहाँ
गिद्ध  जैसी   आस   टपकाती   नज़र

दूध   पीते   की   जहाँ    अस्मत   लुटे
कौन  सी  दुनिया  में  करते  हम बसर ?

जो    गुलामी   दे    हुकूमत   वो   नहीं
मुल्क   ये   कैसा    हुआ,   ओ  बेखबर

लूट    है   ऐसी     मची    चारों   तरफ
कीमतें    सर   पे    रुपैया    पाँव   पर

हाथ   पर  रख   हाथ   सब   हैं   देखते
यों   न   आयी   है   न  आएगी   सहर

किस बयाँ को सच कहें और कब तलक
कब    बदल  जाए  इरादा   क्या  खबर

कौन   सच  का  साथ  देता  है  ‘भरत’
चाहत - ए - दौलत  बड़ी,  बाकी सिफर

ہو گیا خون خوار اب تو ہر شہر
فطرتوں میں گھل گیا ایسا زہر

دیکھتے ہیں سب تماشا بس یہاں
گدھ جیسے آس ٹپکتی نظر

دودھ پیتے کی جہاں عصمت لٹے
کونسی دنیا میں کرتے ہم بسر ؟

جو غلامی دے حکومت وہ نہیں
ملک یہ کیسا ہوا، او بے خبر

لوٹ ہے ایسی مچی چاروں طرف
قیمتیں سر پے روپیہ پاؤں پر

ہاتھ پر رکھ ہاتھ سب ہیں دیکھتے
یوں نہ آی ہے نہ آےگی سحر

کس بیاں کو سچ کہیں اور کب تلک
کب بدل جائے ارادہ کیا خبر

کون سچ کا ساتھ دیتا ہے "بھرت "
چاہت دولت بڑی، باقی صفر

ho  gaya khooNkhar ab toh har shahar
fitratoN   me  ghul   gaya   aisa  zehar

dekhte  hain   sab  tamasha bas yahan
giddh   jaisi     aas     tap'ka'ti    nazar

doodh  peete   ki   jahaN   asmat   lute
koun  si  duniya me karte  ham basar ?

jo   gulami   de    huqumat   voh  nahi
mulk  ye   kaisa  hua,   O   bekhabar !

loot  hai   aisi   machi   charoN    taraf
keemateN sar pe  ru’pai’ya paaNv  par

haath par rakh haath  sab hain dekhte
yoN   na   aayi   hai   na  aayegi  sahar

kis bayaN ko sach kahen aur kab talak
kab   badal   jaye   iraada  kya  khabar

koun sach  ka saath  deta hai ‘bharat’
chahat - e - doulat   badi,  baki   sifar

urdu courtesy dear friend samina mir

22/6/13

ले गया वो चैन बिस्तर का गया जब ghazal | ग़ज़ल | غزل‎

1 टिप्पणी:

ले गया वो चैन बिस्तर का गया जब
फूल रहते थे जहाँ काँटे वहां अब

काश के ये जाँ निकल जाए बदन से
करवटें बदलीं न जाती ए खुदा अब

हर तरफ़ है शान और पहचान उसकी
सच सुना है के मुहब्बत मे मिले रब

ख़्वाब पर पाबंदियां लगती नहीं हैं
जाना मैंने साथ उसके मैं रहा जब

दर्द ए दिल का उस से है नाता पुराना
धडकनें बढ़ने लगीं लो आ गयी शब

भूलने की कोशिशें करता नहीं मैं
ज़ीस्त चलती है सहारे याद के जब

चूम कर तस्वीर सीने से लगा ली
बंद कर ली आँख, तेरे साथ हूँ अब

ख़त ‘भरत’ के नाम गर जो एक लिख दो
याद आ जाए पता अपना उसे तब

Le gaya vo chain bistar ka gaya jab
Phool rahte the jahan kaante uge ab

kaash ke ye jaan nikal jaaye badan se
karvaten badlin na jaati ai khuda ab

har taraf hai shaan aur pahchaan uski
sach suna hai ke muhabbat me mile rab

Roz milta hoon yahan khwabon tale mai
ho gaye tum gair ke toh kya sanam ab

dard e dil ka us se hai naata purana
dhadkane badhne lagin lo aa gayi shab

bhoolne ki koshishen karta nahi mai
zeest chalti hai sahare yaad ke ab

choom kar tasveer seene se laga li
band kar li aankh, tere saath hoon ab

khat bharat ke naam gar jo ek likh do
yaad aa jaye pata apna use tab


ے گیا وہ چین بستر کا گیا جب
پھول رہتے تھے جہاں کانٹے اگے اب

کاش که یہ جان نکل جائے بدن سے
کروٹیں بدلی نہیں جاتیں اے خدا اب

ہر طرف ہے شان اور پہچان اسکی
سچ سنا ہے کہ محبت میں ملے رب

روز ملتا ہوں یہاں خوابوں تلے میں
ہو گئے تم غیر کے تو کیا صنم اب

درد دل کا اس سے ہے ناتا پرانا
دھڑکنیں بڑھنے لگیں لو آ گی شب

بھولنے کی کوششیں کرتا نہیں میں
زیست چلتی ہے سہارے یاد کے اب

چوم کر تصویر سینے سے لگا لی
بند کر لی آنکھ، تیرے ساتھ ہوں اب

خط "بھرت " کے نام جو ایک لکھ دو
یاد آ جائے پتا اپنا اسے تب

18/6/13

सारे रंगों वाली लड़की - 2

2 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
दूरी से उपजती पीड़ा
अहाते में सूखता सा मनीप्लांट
जैसे मर ही जाएगा
फ़िर आयी
बिना-बताये-आने-वाली-दोपहर
उसकी बेल आम के पेड़ पर चिपकी है
पता नहीं क्यों नहीं मरा
नियति
और कैसे पेड़ के तने को छू गया
पत्तों का विस्तार
देखते-देखते हथेलियों से बड़ा हो गया
वेदना – जब लगा कि जायेगी
स्मृतियों को खबोड़
जड़ से लगी यादें बाहर आने लगी
दर्द पुराना साथी
सहारा देता है – फ़िर क्या धूप क्या अमावस
दूर गए प्रेम की खोज
मिल ही जाता है स्मृति का कोई तना
ब्रह्माण्ड की हथेली से बड़ा रुदन तब अनुभूति का
कैसे मरे ये वेदना

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

सारे रंगों वाली लड़की
वृक्षों में भी हो ना


भरत तिवारी १८.६.२०१३, नई दिल्ली 

11/6/13

सारे रंगों वाली लड़की

12 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
कहाँ हो

सूरज इस काली रात को
जिसने सब छिपा लिया
उसे धराशाई कर रहा है

आम के पेड़ में  अभी-अभी जागी कोयल
धानी से रंग का बौर
सब दिख रहे हैं
उन आँखों को
जो तुम्हे देखने के लिए ही बनीं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

तुम्हारी साँसों का चलना
मेरी साँसों का चलना है
और अब मेरी साँसें दूर हो रही हैं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

गए दिनों के प्रेमपत्र पढ़ता हूँ
जो बाद में आया – वो पहले
सूख रही बेल का दीवार से उघड़ना
सिरे से देखते हुए जड़ तक पहुँचा मैं
पहले प्रेमपत्र को थामे देख रहा हूँ – पढ़ रहा हूँ
देख रहा हूँ पहले प्रेमपत्र में दिखते प्यार को
और वहीँ दिख रहा है नीचे से झांकता सबसे बाद वाला पत्र
और दूर होता प्रेम

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

वहाँ हो
यहाँ हो


भरत तिवारी, ११.६.२०१३  नई दिल्ली 


7/6/13

नज़्म نظم nazm

5 टिप्‍पणियां:



उस एक पल
जिसमे तुम मुझसे मिलोगे
कैसे कहूँ कि उसका इंतज़ार नहीं
क्या झूठ बोल दूँ
याद नहीं करता
ना
इंतज़ार रेल की पटरी जित्ता लंबा
भारी नहीं हुआ कभी
किनारे बैठ कर रस्ता तकना
उबाऊ नहीं - उम्मीद है
अभी तुम दिख जाओगे
पगडंडियों पर शाम का रंग बिखरने में
वक्त लगता है
ज़रुरी है क्या
शाम जाये तो पूरा चाँद आये
ना
पूरा चाँद आये तो होली हो
ना
इंतज़ार जाये तो तुम आओ
हाँ
... भरत


اس ایک پل 
جس میں تم مجھ سے ملو گی 
کیسے کہہ دوں کہ اس کا انتظار نہیں 
کیا جھوٹ بول دوں 
یاد نہیں کرتا 
نہ 
انتظار ریل کی پٹری جتا 
بھاری نہیں ہوا کبھی 
کنارے بیٹھ کر رستہ تکنا
اباو نہیں - امید ہے
ابھی تم دکھ جاؤ گے 
پگڈنڈیوں پر شام کا رنگ بکھرنے میں 
وقت لگتا ہے 
ضروری ہے کیا 
شام جائے تو پورا چاند آے 
نا 
پورا چاند آے تو ہولی ہو 
نا 
انتظار جائے تو تم آؤ 
ہاں
...بھرت
us ek pal
jis’me tum mujh’se miloge
kaise kah dooN ki uska intzar nahi
kya jhooth bol dooN
yaad nahi karta
naa
iNtzaar rail ki patri jit’ta 
bhari nahi hua kabhi
kinare baith kar r’sta takna
ubaoo  nahi – ummed hai
abhi tum dikh jaoge
pag’dan’diyoN (par sham ka raNg bikharne meN
waqt lagta hai
zaruri hai kya
sham jaye to poora chaNd aaye
naa
pura chaand aaye to holi ho
naa
intzar jaye toh tum aao
haaN
... Bharat


urdu courtesy dear friend Samina Mir

25/5/13

कैसे मुझे अब नींद, इस बिस्तर पे आयेगी कभी / kaise mujhe ab neeNd iss, bistar pe aayegi kabhi / کیسے مجھے اب نیند اس، بستر پے آے گی کبھی

7 टिप्‍पणियां:


==-= ==-= ==-= ==-=
कैसे मुझे अब नींद, इस बिस्तर पे आयेगी कभी
यादों भरी सिलवट तिरी, दिल से न जायेगी कभी
बस याद तेरी रह गयीं, मेरे दिल-ए-बरबाद में
परछाइयों से तू निकल, अब जिस्म पायेगी कभी 
दे तू मुझे अब मौत दे, रब्बा नहीं जीना मुझे
अब ये सज़ा तू खत्म कर, अब वो न आयेगी कभी
टूटी हुई साँसे मेरी, थमती हुई ये धड़कने
दोनों करें इंतजार के आवाज़ आयेगी कभी
कोई नहीं मेरा यहाँ, बस इक तिरी तस्वीर है
सोचा करे तुझको ‘भरत’ चुपचाप आएगी कभी 
kaise mujhe ab neeNd iss, bistar pe aayegi kabhi
yadoN bhari silvat teri, dil se na jayegi kabhi
bas yaad teri rah gayi, mere dil e barbaad meN
par’chha’iyoN se tu nikal,  ab jism payegi kabhi
de tu mujhe ab mout de, rabba nahi jeena mujhe
ab ye saza tu khtm kar, ab vo na aayegi kabhi
tooti hui saaNseN meri, tham’ti hui ye dhadkaneN
dono kareN intzaar ke aavaz aayegi kabhi
koi nahi mera yahaN, bas ik teri tasveer hai
socha kare tujhko ‘bharat’, chupchaap aayegi kabhi
urdu: courtesy dear friend Samina Mir

کیسے  مجھے اب نیند  اس،  بستر پے آے گی کبھی
یادوں  بھری سلوٹ تیری، دل سے نہ جاۓ گی کبھی

بس یاد تیری رہ گیئ، میرے دل برباد میں
پرچھایوں سے تو نکل، اب جسم پاے گی کبھی

دے تو مجھے اب موت دے، ربا نہیں جینا مجھے
اب یہ سزا  تو ختم کر، اب وہ نہ آے گی کبھی

ٹوٹی ہوئی سانسیں میری، تھمتی ہوئی یہ دھڑکنیں
دونوں کریں انتظار کہ آواز آے گی کبھی

کوئی نہیں میرا یہاں، بس اک تیری تصویر ہے
سوچا کرے تجھ کو "بھرت "، چپ چاپ آے گی کبھی


10/5/13

ज़रा ठहरो ذرا ٹھہرو zara thahro

2 टिप्‍पणियां:
ज़रा ठहरो अभी इक साँस पुरानी बची है
तिरे आने कि इक उम्मीद भुलानी बची है ...

गली के छोर पे बचपन ठिठरा सा खड़ा है
दिखाई दे रहा बाक़ी कहानी बची है ...

हमें मालुम तिरी हर चाल मगर कौन बोले
शक्ल पर और कितनी शक्ल लगानी बची है ...

उम्र बढ़ती रही पर तिफ्ल-मिज़ाजी वही है
लहू कि गर्मजोशी और जवानी बची है ...

फलक पर चाँदनी अब देख नहीं पाता अकेले
‘भरत’ ये उम्र कितनी और बितानी बची है ...

ذرا ٹھہرو ابھی اک سانس پرانی بچی ہے
تیرے آنے کی اک امید بھلانی  بچی ہے

گلی کے چھور پے بچپن ٹھٹھرتا سا کھڑا ہے
دکھایی دے رہا کچھ باقی کہانی بچی ہے

ہمیں معلوم تیری ہر چال مگر کون بولے
شکل پر اور کتنی شکل لگانی بچی ہے

عمر بڑھتی رہی پر طفل مزاجی وہی ہے
لہو کی گرم جوشی اور جوانی بچی ہے

فلک پر چاندنی اب دیکھ نہیں پاتا اکیلے
"بھرت " یہ عمر کتنی اور بتانی بچی ہے



zara thahro abhi ik saNs purani bachi hai
tire aane ki ik um’meed bhulani bachi hai

gali ke chhor pe bachpan thith’ra sa khada hai
dikhai de raha kuch baqi kahani bachi hai

hame malum tiri har chal magar koun bole
sh’kl par aur kitni sh’kl lagani bachi hai

umr badhti rahi par tifl- mizaji vahi hai
lahu ki garmjoshi aur javani bachi hai

falak par chaNdni ab dekh nahi pata akele
‘bharat’ ye umr kitni aur bitani bachi hai

22/4/13

नए साहब सुनो !

2 टिप्‍पणियां:

कैसा नया माहौल 
बना रहा हो ये 

...हाँ सुना है
जब साहब होते थे
तब 
साहब ही साहब होते थे...
देखा है पर्दे पर 
बेंत चटकाते
धप धप करते ऊँचे भारी जूतों को
किरर्र किरर्र करती मशीन
नोक को फैला 
दिखाती थी साहबों की चालें ...
मगर अब तो 
वो मशीन भी ना रही
तो क्या - 
वो स्वेत श्याम माहौल 
अब आँखों के सामने 
रंग कर दिखाओगे ...

नए साहब लोगों सुनो 
कुछ धहक रहा है
पहले धीमा था
मगर अब
लील खायेगा तुमको  



- भरत 

8/4/13

हुजूम-ए-तन्हाई | hujum-e-tanhai | ھجوم تنہائی

5 टिप्‍पणियां:
हुजूम-ए-तन्हाई | hujum-e-tanhai | ھجوم تنہائی bharat tiwari nazm भरत तिवारी नज़्म
मैं उससे कहना चाहता हूँ -
अपने वजूद की भीड़
को एकट्ठा करके
मुझे बीच में बैठा दो
वहीँ पसर जाऊं
शीशमहल सा जिधर देखूं
तुम्हारी आँखें मेरी आँखें

आखिर ये क्या बात हुई
के
अकेले रहने की सजा दे
चले गए...
और जमा कर गए वो भीड़
के तन्हाई को हर चेहरा और बढ़ा दे
जैसे
क़ैद-ए-बामशक्कत का फरमान

Mai us’se kahna chahta hoon
Apne wujud ki bheed
Ko ekat’tha karke
Mujhe beech me baitha do
Vahin pasar jaauN
Sheesh-mahal sa jidhar dekhooN
Tumhari aankheN meri aankheN

Aakhir ye kya baat hui
Ke
Akele rahne ki saza de
Chale gaye…
Aur jama kar gaye vo bheed
Ke tanhaai ko har chehra aur badha de
Jaise
Qaid-e-ba’mashakkat ka farmaan
میں اس سے کہنا چاہتا ہوں
اپنے وجود کی بھیڑ
کو اکٹھا کر کے
مجھے بیچ میں بیٹھا دو
وہیں پسر جاؤں
شیش محل سا جدھر دیکھوں
تمہاری آنکھیں میری آنکھیں

آخر یہ کیا بات ہوئی
کہ
اکیلے رہنے کی سزا دے
چلے گئے
اور جمع کر گئے وہ بھیڑ
کہ تنہائی کو ہر چہرہ اور
بڑھا دے جیسے
قید با مشقت کا فرمان
Urdu courtesy dear friend Samina Mir.

29/3/13

सब छूट जाता है

4 टिप्‍पणियां:

सब छूट जाता है
जिसका छूटता है उसे क्या पता
एक-एक पल बेच
कल खरीदता
खुशियाँ बेचता
खरीदने के लिए - ख़ुशी
फिर
सब छूट जाता है
बेचे हुए पल और खुशियाँ ही रास्ता देखते हैं
सब छूट जाता है Time Reveals Truth Giovanni Domenico Cerrini
ख़रीदी खुशियों के कितने खरीददार कितने उम्मीदवार
चक्र में पीछे
अनभिज्ञ
हाथ उठा दर्ज करते
अपनी लालसा
भीड़ उठाये हाथ लालसा के  
खरीदने को अनवरत हाथापाई करती
खरीदती ! घातु कागज़ पत्थर के सपने
बेचती आँचल महक मुस्कान,
दुलार बचपन जवानी,
गाँव गली प्यार
अपने सपने
तभी
सब छूट जाता है

कुछ ना बना सकने वाला
बनाने वाले की कृति पर अपना नाम लिख
अपनी मान लेता ,
खुश होता
अपनी बता
अपनी समझ
चक्र का हिस्सा है
चक्र घुमा
और
सब छूट जाता है

17/3/13

भूख खबर मवाद

2 टिप्‍पणियां:

हिंदी कविता समाज की गंदगी खबर
         खबर
         भूख की
         भूखों की
         भूख बेचने वालों की
         नंगों की
         नंगे होतों की
         नंगे करे जातों की
         जंगल की
         जंगलियों की
         जंगलराज की
         जंगल बचाने की
         ... डिमांड में है
         जंगलियों की भूख बढ़ रही है
         डिमांड की नियति – बदलते रहना


         खबर
         बेचने की
         बिकने की
         बिक गए की
         देश की
         विदेश की
         देशप्रेम की
         विदेश प्रेम की
         ... डिमांड में है
         प्रेम बिक रहा है
         प्रेम की नियति – बदल रही है

         अन्दर झाँकना बंद कर दिया
         बाहर देखना मना है
         मैल –
         चमड़ी का पोर पार कर गयी
         रंग खून का और रंगत मवाद की
         मवाद से चले खबरी-मसाला-मशीन
         खबरों के प्रेमी -
              सब ...

14/3/13

कहाँ हो मम्मी...!

3 टिप्‍पणियां:
कहाँ हो मम्मी...!
छत पर..
रसोई में ..
बाहर गार्डन में...
स्कूल से तो आगई होंगी.. !?!

बगीचे में गौरैया भी पूछ रही है..

रसोई के सारे मर्तबान चुप हैं..

मेरी चरखी की सद्दी पीली हो गयी अब तो,

स्कूल चल रहा है..

कहाँ हो मम्मी...?
where are you mother poetry bharat tiwari shajar कहाँ हो मम्मी कविता भरत तिवारी शजर
कैक्टस का फूल
- रात खिला था ,
गए सालों जैसा ,
कमल सा मुह बाये...
तुम्हे खोज रहा था...
सुबह सूख गया , अगले साल तक के लिए,

आधी गौरैया कहीं चली गयीं...

पतंग का रंग उड़ गया..............
हाथ लगाया तो कन्ना टूट गया..

मर्तबान से अचार की महक भी चली गयी........

स्कूल में नयी बिल्डिंग बनी देखी,
लड़कियां टीचर को मैडम बुलाती हैं,
'बहन जी ' नहीं.......!

कहाँ हो मम्मी..

सब बदल रहा है,

लेकिन चाँद नहीं बदला...
करवा चौथ भी नहीं..
बस गणेश जी नहीं आते गन्दा करने अब,

उनके साथ हो न आप....!?!
चाँद के पीछे..

देख रही होगी..
मैं भी नहीं बदला ......
"Mother and Child" by Seshadri Sreenivasan

- शजर

27/2/13

आठवां

4 टिप्‍पणियां:



परिंदा बन रहा हूँ
परों पर कोपलें
उग रही हैं

सुना है
तुमने
सात आकाश बनाये हैं
मुझे आठवां देखना है

और तुम जिस आकाश से देखते हो
उसमें तुम्हे
देख लेता हूँ
खिड़की का पर्दा हटा कर

4/2/13

है पता उसको hai pata usko

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है पता उसको कि अर्ज़ी कब तिरी कितनी सही
माँगना  पड़ता  नहीं  कुछ,  आप दाता से कभी

इम्तिहाँ गर वो न लेगा, और लेगा कौन फ़िर ?
दे सज़ा जो गल्तियों की,  लाड भी करता वही

आग दोजख की उगलती है जुबां गुस्सा न कर
राख  किस को तू करे यों, सोच ये  भी  तो सही

रात -  दिन में फर्क क्या है,  बंद कर  ली आँख जब
अक्ल अपनी कम लगा तो फ़िर दिखे जल्वागिरी

अर्श आ जाये यहीं, अपनी नज़र नीची तो कर
हुस्न उसका देखने  जाना  ‘शजर’  पड़ता नही

hai   pata  usko  ki   arzi   kab  tiri   kitni  sahi
maNgna padta nahi kuch, aap daata se kabhi

imtihaaN  gar vo  na lega, aur lega koun fir ?
de saza jo galtiyoN kii, ladd bhi karta vahi

aag dojakh kii uglati hai zubaaN gussa na kar
raakh kis ko tu kar  yoN,  soch ye bhi to sahi

raat din me fark kya hai, band kar li aaNkh jab
akl  apni  kam  laga toh  fir  dikhe  jalva’giri

arsh aa jaye yahiN, apni nazar neechi to kar
husn  uska dekhne jaana ‘shajar’ padta nahi

21/1/13

जब नक़ाब-ए-दोस्ती बिकने लगी | jab naqab-e-dosti bikne lagi

3 टिप्‍पणियां:
Chaos after the news by Darwin Leon
नयी गज़ल के कुछ शेर
जब नक़ाब-ए-दोस्ती बिकने लगी,
साँस घुटती सिसकियाँ भरने लगी...

शक्ल असली सामने आ ही गयी,
चुस्त बखिया थी मगर खुलने लगी...

कम नहीं थे गम यहाँ पहले भी कुछ,
लो अटकती साँस भी रुकने लगी...

दूरियों के छुप ना पाये तब निशाँ,
जब ज़रा सी बात भी बढ़ने लगी...

इश्क भी ना बच सका माहौल से,
चाल शतरंजी यहाँ बिछने लगी...

...शजर 
nayi ghazal ke kuch sher 
jab naqab-e-dosti bikne lagi,
saaNs ghut'ti siskiyaN bharne lagi...

shakl asli saamne aa hi gayi,
chust bakhiya thi magar khulne lagi...

kam nahi the gham yahaN pahle bhi kuch,
lo atak’ti saaNs bhi rukne lagi...

dooriyoN ke chhup na paye tab nishanN,
jab zara si baat bhi badhne lagi...

ishq bhi naa bach saka ma'houl se,
chaal shat’raNji yahaN bichhne lagi...

... shajar

14/1/13

albumoN me qaid haiN lamhe hasiN

2 टिप्‍पणियां:

अलबमों में क़ैद हैं लम्हे हसीं
कैद है उसमे दुपहरी बचपने की
क़ैद हैं शाम-ए जवां की धड़कने
क़ैद है वो दोस्ती जो खो गयी
क़ैद है माँ की हँसी जो सो गयी
    ज़र्द होते कागजों के रंग में
    कैद हैं तारीख जो मिटती नहीं
    कैद हैं वो याद जो जाती नहीं
    कैद है वो शाम जो आती नहीं

तोड़ दें इस क़ैद को आओ अभी

    क़ैद से आजाद कर दे साँस को
    क़ैद से बाहर ले आयें तितलियाँ
    क़ैद से बुलबुल को भी बाहर करें
        क़ैद से हर क़ैद को अब तोड़ कर
    आओ कर लें क़ैद अपने दिल जवां

सात समन्दर का ये पहरा
    कुछ न फिर कर पायेगा
    देखना जान-ए-जिगर
जब वो मंजर आएगा

                              : शजर 

albumoN me qaid haiN lamhe hasiN
qaid haiN usme duphari bachpane ki
qaid haiN sham-e-jawaN ki dhadkaneN
qaid hai vo dosti jo kho gayi
qaid hai maa ki haNsi jo so gayi
    zard hot’te kagazoN ke raNg meN
    qaid haiN taarikh jo mit’ti nahiN
    qaid hai vo yaad jo jaati nahiN
    qaid hai vo sham jo aati nahiN

todd deN is qaid ko aao abhi

    qaid se aazad kar deN saaNs ko
    qaid se bahar le aayen titliyan
    qaid se bulbul ko bhi bahar kareN
        qaid se har qaid ko ab todd kar
aao kar leN qaid apne dil jawaN

saat samandar ka ye pahra
    kuch na fir kar payega
    dekhna jaan-e-jigar
jab vo manzar aayega

                              : Shajar

7/1/13

फ़िर करी गंगा मैली

1 टिप्पणी:

गंगा ने हो निर्मल
अभी बहना शरू करा था
अभी निर्मल हुई भर थी
अस्थियों से दामिनी की
हो पवित्र 
मिलती नहीं वो राख सदियों
जो कर सके यों निर्मल 

अभी बहना शरू करा भर था
आये नहाने 
अपने किये करे की 
बोलती राख से सने 
बकरी सा मैं-मैं करते 
लेडियाँ हाथ में लिये
मैं मैं

इतना अहम 
इतनी अहम 
सह ना सकी
बह ना सकी 
साफ़ और रह ना सकी
दामिनी तो स्वच्छ थी
दामिनी तो स्वच्छ है
स्वच्छता की देवी वो
चल पड़ी आगे वहाँ को
न पहुँचे जहाँ वो - जो हर जगह पहुँचे 

वसुंधरा की सीध में आकाश गंगा थी
प्रलय से बचाने को जिसने लड़ा
ना देखें हम जो - 
दिखा कर हमें
खुश थी शिव की जटा की राख को पा कर

बकरियों के झुंड पहले
छुप के आये 
बाँए से आये
दाएँ से आये 

वो भी आये जो कभी ना आये 
बहती गंगा में खूब नहाये 
वर्षों वर्ष की मैल 
दाएँ-बाएं छुपाये

क्यों ना हो फ़िर गंगा मैली
फ़िर करी गंगा मैली

'शजर' ७.१.१३ - ०४:१८

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