27/2/13

आठवां

4 टिप्‍पणियां:



परिंदा बन रहा हूँ
परों पर कोपलें
उग रही हैं

सुना है
तुमने
सात आकाश बनाये हैं
मुझे आठवां देखना है

और तुम जिस आकाश से देखते हो
उसमें तुम्हे
देख लेता हूँ
खिड़की का पर्दा हटा कर

12/2/13

बड़े दिन पर खिला है गुल | bade din par khila hai gul

5 टिप्‍पणियां:
बड़े दिन पर खिला है गुल,  लगाना मत नज़र अब तुम
अभी तितली को आना है , उठाना मत नज़र अब तुम
फलक के पार तक उड़ना अगर हो बाज़ सा बन कर
हवा को देखना हरदम हटाना मत नज़र अब तुम 
अभी तो बस ज़रा सा ही तुम्हे उसने बनाया है 
खुदी को भूल ना जाना, फिराना मत नज़र अब तुम
बुलंदी कामयाबी की बना देती है दीवाना 
बुजुर्गों की सुना करना उठाना मत नज़र अब तुम
तुझे पैदा किया जिसने , रगों में खून दौड़ाया
उसे कैसे भुला डाला, मिलाना मत नज़र अब तुम 
‘शजर’ डरता नहीं है वो खरा औ साफ़ दिल हो जो 
उसे ना छेड़ना बिलकुल दिखाना मत नज़र अब तुम
bade din par khila hai gul 
lagana mat nazar ab tum
abhi titli ko aana hai 
uthana mat nazar ab tum
falak ke paar tak uddna 
agar ho baaz saa ban kar
hava ko dekhna hardam 
hatana mat nazar ab tum
abhi to bas zara sa hi 
tumhe usne banaya hai
khudi ko bhool naa jana 
firana mat nazar ab tum
bulandi kamyabi ki 
bana deti hai dewana
buzurgon ki suna karna 
utthana mat nazar ab tum
tujhe paida kiya jisne 
ragoN me khoon doudaya
use kaise bhula dala 
milana mat nazar ab tum
‘shajar’ darta nahi hai vo 
khara au saaf dil ho jo 
usse na cheddna bilkul 
dikhana mat nazar ab tum

4/2/13

है पता उसको hai pata usko

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है पता उसको कि अर्ज़ी कब तिरी कितनी सही
माँगना  पड़ता  नहीं  कुछ,  आप दाता से कभी

इम्तिहाँ गर वो न लेगा, और लेगा कौन फ़िर ?
दे सज़ा जो गल्तियों की,  लाड भी करता वही

आग दोजख की उगलती है जुबां गुस्सा न कर
राख  किस को तू करे यों, सोच ये  भी  तो सही

रात -  दिन में फर्क क्या है,  बंद कर  ली आँख जब
अक्ल अपनी कम लगा तो फ़िर दिखे जल्वागिरी

अर्श आ जाये यहीं, अपनी नज़र नीची तो कर
हुस्न उसका देखने  जाना  ‘शजर’  पड़ता नही

hai   pata  usko  ki   arzi   kab  tiri   kitni  sahi
maNgna padta nahi kuch, aap daata se kabhi

imtihaaN  gar vo  na lega, aur lega koun fir ?
de saza jo galtiyoN kii, ladd bhi karta vahi

aag dojakh kii uglati hai zubaaN gussa na kar
raakh kis ko tu kar  yoN,  soch ye bhi to sahi

raat din me fark kya hai, band kar li aaNkh jab
akl  apni  kam  laga toh  fir  dikhe  jalva’giri

arsh aa jaye yahiN, apni nazar neechi to kar
husn  uska dekhne jaana ‘shajar’ padta nahi

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