22/6/13

ले गया वो चैन बिस्तर का गया जब ghazal | ग़ज़ल | غزل‎

1 टिप्पणी:

ले गया वो चैन बिस्तर का गया जब
फूल रहते थे जहाँ काँटे वहां अब

काश के ये जाँ निकल जाए बदन से
करवटें बदलीं न जाती ए खुदा अब

हर तरफ़ है शान और पहचान उसकी
सच सुना है के मुहब्बत मे मिले रब

ख़्वाब पर पाबंदियां लगती नहीं हैं
जाना मैंने साथ उसके मैं रहा जब

दर्द ए दिल का उस से है नाता पुराना
धडकनें बढ़ने लगीं लो आ गयी शब

भूलने की कोशिशें करता नहीं मैं
ज़ीस्त चलती है सहारे याद के जब

चूम कर तस्वीर सीने से लगा ली
बंद कर ली आँख, तेरे साथ हूँ अब

ख़त ‘भरत’ के नाम गर जो एक लिख दो
याद आ जाए पता अपना उसे तब

Le gaya vo chain bistar ka gaya jab
Phool rahte the jahan kaante uge ab

kaash ke ye jaan nikal jaaye badan se
karvaten badlin na jaati ai khuda ab

har taraf hai shaan aur pahchaan uski
sach suna hai ke muhabbat me mile rab

Roz milta hoon yahan khwabon tale mai
ho gaye tum gair ke toh kya sanam ab

dard e dil ka us se hai naata purana
dhadkane badhne lagin lo aa gayi shab

bhoolne ki koshishen karta nahi mai
zeest chalti hai sahare yaad ke ab

choom kar tasveer seene se laga li
band kar li aankh, tere saath hoon ab

khat bharat ke naam gar jo ek likh do
yaad aa jaye pata apna use tab


ے گیا وہ چین بستر کا گیا جب
پھول رہتے تھے جہاں کانٹے اگے اب

کاش که یہ جان نکل جائے بدن سے
کروٹیں بدلی نہیں جاتیں اے خدا اب

ہر طرف ہے شان اور پہچان اسکی
سچ سنا ہے کہ محبت میں ملے رب

روز ملتا ہوں یہاں خوابوں تلے میں
ہو گئے تم غیر کے تو کیا صنم اب

درد دل کا اس سے ہے ناتا پرانا
دھڑکنیں بڑھنے لگیں لو آ گی شب

بھولنے کی کوششیں کرتا نہیں میں
زیست چلتی ہے سہارے یاد کے اب

چوم کر تصویر سینے سے لگا لی
بند کر لی آنکھ، تیرے ساتھ ہوں اب

خط "بھرت " کے نام جو ایک لکھ دو
یاد آ جائے پتا اپنا اسے تب

18/6/13

सारे रंगों वाली लड़की - 2

2 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
दूरी से उपजती पीड़ा
अहाते में सूखता सा मनीप्लांट
जैसे मर ही जाएगा
फ़िर आयी
बिना-बताये-आने-वाली-दोपहर
उसकी बेल आम के पेड़ पर चिपकी है
पता नहीं क्यों नहीं मरा
नियति
और कैसे पेड़ के तने को छू गया
पत्तों का विस्तार
देखते-देखते हथेलियों से बड़ा हो गया
वेदना – जब लगा कि जायेगी
स्मृतियों को खबोड़
जड़ से लगी यादें बाहर आने लगी
दर्द पुराना साथी
सहारा देता है – फ़िर क्या धूप क्या अमावस
दूर गए प्रेम की खोज
मिल ही जाता है स्मृति का कोई तना
ब्रह्माण्ड की हथेली से बड़ा रुदन तब अनुभूति का
कैसे मरे ये वेदना

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

सारे रंगों वाली लड़की
वृक्षों में भी हो ना


भरत तिवारी १८.६.२०१३, नई दिल्ली 

11/6/13

सारे रंगों वाली लड़की

12 टिप्‍पणियां:
सारे रंगों वाली लड़की
bharat tiwari भरत तिवारी poetry poet shayar delhi कविता कवि प्रेम love
कहाँ हो

सूरज इस काली रात को
जिसने सब छिपा लिया
उसे धराशाई कर रहा है

आम के पेड़ में  अभी-अभी जागी कोयल
धानी से रंग का बौर
सब दिख रहे हैं
उन आँखों को
जो तुम्हे देखने के लिए ही बनीं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

तुम्हारी साँसों का चलना
मेरी साँसों का चलना है
और अब मेरी साँसें दूर हो रही हैं

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

गए दिनों के प्रेमपत्र पढ़ता हूँ
जो बाद में आया – वो पहले
सूख रही बेल का दीवार से उघड़ना
सिरे से देखते हुए जड़ तक पहुँचा मैं
पहले प्रेमपत्र को थामे देख रहा हूँ – पढ़ रहा हूँ
देख रहा हूँ पहले प्रेमपत्र में दिखते प्यार को
और वहीँ दिख रहा है नीचे से झांकता सबसे बाद वाला पत्र
और दूर होता प्रेम

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

वहाँ हो
यहाँ हो


भरत तिवारी, ११.६.२०१३  नई दिल्ली 


7/6/13

नज़्म نظم nazm

5 टिप्‍पणियां:



उस एक पल
जिसमे तुम मुझसे मिलोगे
कैसे कहूँ कि उसका इंतज़ार नहीं
क्या झूठ बोल दूँ
याद नहीं करता
ना
इंतज़ार रेल की पटरी जित्ता लंबा
भारी नहीं हुआ कभी
किनारे बैठ कर रस्ता तकना
उबाऊ नहीं - उम्मीद है
अभी तुम दिख जाओगे
पगडंडियों पर शाम का रंग बिखरने में
वक्त लगता है
ज़रुरी है क्या
शाम जाये तो पूरा चाँद आये
ना
पूरा चाँद आये तो होली हो
ना
इंतज़ार जाये तो तुम आओ
हाँ
... भरत


اس ایک پل 
جس میں تم مجھ سے ملو گی 
کیسے کہہ دوں کہ اس کا انتظار نہیں 
کیا جھوٹ بول دوں 
یاد نہیں کرتا 
نہ 
انتظار ریل کی پٹری جتا 
بھاری نہیں ہوا کبھی 
کنارے بیٹھ کر رستہ تکنا
اباو نہیں - امید ہے
ابھی تم دکھ جاؤ گے 
پگڈنڈیوں پر شام کا رنگ بکھرنے میں 
وقت لگتا ہے 
ضروری ہے کیا 
شام جائے تو پورا چاند آے 
نا 
پورا چاند آے تو ہولی ہو 
نا 
انتظار جائے تو تم آؤ 
ہاں
...بھرت
us ek pal
jis’me tum mujh’se miloge
kaise kah dooN ki uska intzar nahi
kya jhooth bol dooN
yaad nahi karta
naa
iNtzaar rail ki patri jit’ta 
bhari nahi hua kabhi
kinare baith kar r’sta takna
ubaoo  nahi – ummed hai
abhi tum dikh jaoge
pag’dan’diyoN (par sham ka raNg bikharne meN
waqt lagta hai
zaruri hai kya
sham jaye to poora chaNd aaye
naa
pura chaand aaye to holi ho
naa
intzar jaye toh tum aao
haaN
... Bharat


urdu courtesy dear friend Samina Mir

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