18/6/13

सारे रंगों वाली लड़की - 2

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो
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दूरी से उपजती पीड़ा
अहाते में सूखता सा मनीप्लांट
जैसे मर ही जाएगा
फ़िर आयी
बिना-बताये-आने-वाली-दोपहर
उसकी बेल आम के पेड़ पर चिपकी है
पता नहीं क्यों नहीं मरा
नियति
और कैसे पेड़ के तने को छू गया
पत्तों का विस्तार
देखते-देखते हथेलियों से बड़ा हो गया
वेदना – जब लगा कि जायेगी
स्मृतियों को खबोड़
जड़ से लगी यादें बाहर आने लगी
दर्द पुराना साथी
सहारा देता है – फ़िर क्या धूप क्या अमावस
दूर गए प्रेम की खोज
मिल ही जाता है स्मृति का कोई तना
ब्रह्माण्ड की हथेली से बड़ा रुदन तब अनुभूति का
कैसे मरे ये वेदना

सारे रंगों वाली लड़की
कहाँ हो

सारे रंगों वाली लड़की
वृक्षों में भी हो ना


भरत तिवारी १८.६.२०१३, नई दिल्ली 

2 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द पुराना साथी
    सहारा देता है ..... waah waah ... saare rango wali ladki kahan ho ??? vruksho mai ho naa... bahut khoob bhaav... (Y)

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