11/5/14

जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ

जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ 

mother's day

माँ को ज़हन में रख के कविता कैसे लिखूँ
उसी के जन्मे उसी के हिस्से
को उसके ही बारे में लिखने को

क्या बोलना पढ़ेगा
जो पल-पल माँ को याद किये जाता है
उसे समझ नहीं आता कि माँ नहीं भी हो सकती
माँ बस होती है........... इससे आगे और पीछे ज़हन को नहीं पता

इस रिश्ते की जादूगरी
देखिये
जब भी माँ में होता हूँ छोटा होता हूँ
भूल जाती है
उम्र अपनी सुइयों को
मुस्कान अपने दुखों को
खुशियाँ अपने आप को
और ऐसा और ऐसा बहुत कुछ होने के लिए
माँ का ख्याल ही चाहिए होता है
माँ एक ख्याल ही तो है
एक
अजर
अमर
जिंदा खयाल


भरत तिवारी  ११.०५.२०१४
नई दिल्ली

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर कविता लिखी है भाई जी

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  2. बहुत सुंदर .मार्मिक एवं ह्रदय स्पर्शी .माँ को भला हम अपने से जुदा कर कैसे देख सकते हैं .माँ हम में सदैव जीवित रहती है .
    हमारी सांसों में .हमारी धड़कनों में पल-पल प्रवाहित है हममें .

    उत्तर देंहटाएं

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